मुहर्रम का महीना शुरू होते ही दुनिया भर में एक गमगीन माहौल छा जाता है और हर तरफ ‘या हुसैन’ की गूँज सुनाई देने लगती है। यह कोई जश्न या पारंपरिक त्योहार नहीं, बल्कि इस्लाम के इतिहास का वह पन्ना है जो आज भी इंसानियत की आँखों को नम कर देता है। यह महीना याद दिलाता है उस महान और बेमिसाल शहादत की, जो हक, सच्चाई और मानवीय मूल्यों को बचाने के लिए दी गई थी। अमूमन लोग मुहर्रम को कर्बला के मैदान और इमाम हुसैन की शहादत से जोड़कर देखते हैं, लेकिन इस पूरी दास्तान को समझने के लिए पैगंबर मोहम्मद के दोनों नवासों—इमाम हसन और इमाम हुसैन के जीवन, उनके दृष्टिकोण और उनके संघर्ष को जानना बेहद जरूरी है।
पैगंबर मोहम्मद के लाडले: जन्नत के युवाओं के सरदार
इमाम हसन और इमाम हुसैन सगे भाई थे। वे इस्लाम के आखिरी पैगंबर हज़रत मोहम्मद के नाती और उनके दामाद हज़रत अली व बेटी बीबी फातिमा के बेटे थे। पैगंबर मोहम्मद अपने इन दोनों नवासों से बेपनाह मोहब्बत करते थे और ऐतिहासिक इस्लामी संदर्भों के अनुसार, उन्होंने इन दोनों भाइयों को ‘जन्नत के युवाओं का सरदार’ कहा था। इतिहास में इन दोनों भाइयों का चरित्र और संघर्ष अलग-अलग परिस्थितियों में लेकिन एक ही मकसद यानी इंसानियत और शांति की रक्षा के लिए था।
इमाम हसन: मुस्लिम समाज में शांति और एकता के अग्रदूत
बड़े भाई इमाम हसन का जन्म मदीना में हुआ था। वे बेहद शांत, गंभीर, सहनशील और दूरदर्शी व्यक्तित्व के मालिक थे। पिता हज़रत अली की शहादत के बाद कूफ़ा (इराक़) के लोगों ने इमाम हसन को अपना खलीफा यानी मुस्लिम समाज का राजनीतिक और धार्मिक प्रमुख चुना। लेकिन उस दौर में सीरिया के गवर्नर अमीर मुआविया और इमाम हसन के बीच सत्ता के नियंत्रण को लेकर टकराव की स्थिति बन गई। इमाम हसन ने देखा कि अगर यह टकराव बढ़ता है, तो मुस्लिम समाज आपस में ही लड़कर तबाह हो जाएगा और भारी खून-खराबा होगा।
समाज में शांति और एकता बनाए रखने के लिए उन्होंने एक ऐतिहासिक समझौता किया और खलीफा का पद छोड़ दिया। हालांकि, इस समझौते के कुछ वर्षों बाद, एक गहरी राजनीतिक साजिश के तहत मदीना में इमाम हसन को जहर दे दिया गया, जिससे वे शहीद हो गए। इतिहास उन्हें एक महान त्यागी और शांतिदूत के रूप में याद करता है।
यजीद का क्रूर शासन और इमाम हुसैन का वैचारिक विरोध
इमाम हसन के बाद मुस्लिम समाज के मार्गदर्शन की जिम्मेदारी छोटे भाई इमाम हुसैन पर आई। इसी बीच सत्ता का समीकरण बदला और अमीर मुआविया की मौत के बाद उनका बेटा यजीद दमिश्क (सीरिया) का शासक बन बैठा। यजीद एक क्रूर, स्वेच्छाचारी और अनैतिक शासक था, जो इस्लामी सिद्धांतों की परवाह नहीं करता था। वह अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिए चाहता था कि इमाम हुसैन उसके शासन को अपनी नैतिक और धार्मिक स्वीकृति दें।
लेकिन इमाम हुसैन ने साफ कह दिया कि वे किसी भी तानाशाह या जुल्मी के आगे अपना सिर नहीं झुकाएंगे। इमाम हुसैन का यह विरोध सत्ता के लिए नहीं, बल्कि सिद्धांतों और इंसानी अधिकारों को बचाने की एक वैचारिक क्रांति थी।
कर्बला का ऐतिहासिक युद्ध और महाशहादत



जब यजीद का दबाव बढ़ा, तो इमाम हुसैन अपने परिवार के साथ मदीना छोड़कर इराक की तरफ बढ़ने लगे। लेकिन यजीद की एक विशाल फौज ने उन्हें और उनके कुनबे को इराक के कर्बला नामक तपते हुए रेगिस्तान में घेर लिया। वह ६१ हिजरी (अक्टूबर ६८० ईस्वी) का वक्त था, जब मुहर्रम की पहली तारीख से ही यजीद की सेना ने दबाव बनाना शुरू किया और ७वें मुहर्रम से इमाम हुसैन के खेमे का पानी बंद कर दिया। इस खेमे में महिलाएं, बीमार और छोटे बच्चे भी शामिल थे।
आखिरकार, १०वें मुहर्रम (जिसे आशूरा कहा जाता है) के दिन इतिहास का सबसे दर्दनाक और असमान युद्ध हुआ। एक तरफ यजीद के हजारों हथियारबंद सैनिक थे, तो दूसरी तरफ इमाम हुसैन के सिर्फ ७२ वफादार साथी और परिवार के लोग थे। इमाम हुसैन के ६ महीने के बेटे अली असगर से लेकर उनके भाई-भतीजों को एक-एक करके प्यासा शहीद कर दिया गया। अंत में इमाम हुसैन ने भी सजदे की हालत में अपनी जान कुर्बान कर दी, लेकिन जुल्म के आगे घुटने नहीं टेके।
भारतीय उपमहाद्वीप में मुहर्रम: गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक
आज देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मुहर्रम को अलग तरीकों से याद किया जाता है। भारत और भारतीय उपमहाद्वीप में मुहर्रम का एक अनोखा रंग देखने को मिलता है, जहाँ यह केवल मुस्लिम समुदाय तक सीमित नहीं रहता। यहाँ की गंगा-जमुनी तहज़ीब में हिंदू और अन्य धर्मों के लोग भी अकीदत (श्रद्धा) के साथ शामिल होते हैं। भारत में इमाम हुसैन के प्रतीकात्मक मकबरे के रूप में ‘ताजिया’ निकालने की परंपरा है, जिन्हें बाद में स्थानीय कर्बला में ले जाकर दफनाया जाता है। इसके अलावा, सड़कों पर प्यासों को पानी और शरबत पिलाने के लिए ‘सबील’ लगाई जाती हैं। भारत में एक खास समुदाय ‘हुसैनी ब्राह्मण’ भी है, जो मानते हैं कि उनके पूर्वज राहब दत्त ने कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन की तरफ से लड़ते हुए अपने बेटों की कुर्बानी दी थी।

ईरान और इराक में अजादारी: शोक और मातम का सैलाब
दूसरी तरफ, ईरान, इराक और लेबनान जैसे शिया बहुल देशों में मुहर्रम का माहौल पूरी तरह शोक और अजादारी (मातम) का होता है। लोग काले कपड़े पहनकर बड़ी-बड़ी धार्मिक सभाओं (मजलिस) में इकट्ठा होते हैं, जहाँ कर्बला के दर्दनाक इतिहास को पढ़कर सुनाया जाता है। लोग रोते हैं और छाती पीटकर अपना दुख व्यक्त करते हैं। ईरान में तो ‘ताज़िया’ नाम से एक नाट्य रूपांतरण भी किया जाता है, जिसमें कर्बला की जंग को जीवंत रूप में मंच पर दिखाया जाता है ताकि आने वाली पीढ़ियां इस संघर्ष को समझ सकें।
अरब देशों में सुन्नी समुदाय का नजरिया और रोज़े की परंपरा
अरब देशों और सुन्नी बहुल समाजों में मुहर्रम को याद करने का तरीका थोड़ा अलग है। वहाँ मुहर्रम के ९वें और १०वें दिन रोज़ा (व्रत) रखने की प्राचीन परंपरा है। सुन्नी समाज इमाम हुसैन की शहादत और उनके सिद्धांतों का सर्वोच्च सम्मान करता है, लेकिन वे सड़कों पर जुलूस निकालने या मातम करने के बजाय मस्जिदों में इबादत करते हैं, कुरान का पाठ करते हैं और गरीबों में लंगर (भोजन) बांटकर शहीदों को याद करते हैं।
निष्कर्ष: दुनिया के विचारकों की नजर में इमाम हुसैन का संदेश
आज सदियों बाद भी इमाम हसन और इमाम हुसैन को किसी एक धर्म या दायरे में नहीं बांधा जा सकता। दुनिया भर के विचारकों और इतिहासकारों ने उन्हें मानवाधिकारों और न्याय का वैश्विक प्रतीक माना है। महात्मा गांधी ने भी कहा था कि उन्होंने कर्बला के इतिहास से ही खुद को और देश को अन्याय के खिलाफ खड़ा करना सीखा।
वास्तव में, मुहर्रम का संदेश यह है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, न्याय और इंसानियत का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। इमाम हसन का जीवन जहाँ शांति के लिए समझौते की सीख देता है, वहीं इमाम हुसैन का जीवन सिखाता है कि जब बात सिद्धांतों की हो, तो सिर कटाया जा सकता है, लेकिन झुकाया नहीं जा सकता।







