गया/जहानाबाद: मगध क्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक (IG) विकास वैभव लगातार पूरी तरह से एक्शन मोड में नजर आ रहे हैं। कानून व्यवस्था और पुलिसिंग में पारदर्शिता को लेकर उनकी ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अब धरातल पर कड़ाई से दिखने लगी है।
मगध रेंज के आईजी विकास वैभव ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि उनके इलाके में पुलिसिया मनमानी, भ्रष्टाचार और आम जनता का उत्पीड़न किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बांके बाजार थानेदार पर कार्रवाई के बाद आईजी ने जहानाबाद में न्याय की धज्जियां उड़ाने वाले दो बड़े अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। निलंबित होने वाले अधिकारियों में जहानाबाद के नगर अंचल पुलिस निरीक्षक (सर्कल इंस्पेक्टर) रघुनाथ प्रसाद और नगर थाना के एएसआई सह अनुसंधानकर्ता श्रीकान्त कुमार सिन्हा शामिल हैं।
क्या है पूरा मामला? (रिश्वतखोरों ने पीड़ित को ही बना दिया मुजरिम)
यह पूरा मामला जहानाबाद नगर थाना क्षेत्र का है, जहां रिशु राज नामक एक युवक को अपनी सच्चाई और न्यायप्रियता की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। दिनांक 24 फरवरी 2025 को रिशु राज के साथ उनके विपक्षी अतुल आनंद ने बेरहमी से मारपीट की थी, जिसके बाद पीड़ित ने सदर अस्पताल में अपना इलाज कराया और थाने में प्राथमिकी के लिए शिकायत दी। लेकिन नगर थाना के तत्कालीन थानाध्यक्ष दिवाकर विश्वकर्मा ने रिशु के आवेदन पर कोई कानूनी कार्रवाई करने के बजाय उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया।
हद तो तब हो गई जब विपक्षी अतुल आनंद ने कोर्ट के माध्यम से एक झूठा परिवाद दर्ज करा दिया। इस केस में राहत देने के नाम पर केस के अनुसंधानकर्ता श्रीकान्त कुमार सिन्हा ने पीड़ित रिशु राज से ₹30,000 की रिश्वत मांगी। जब स्वाभिमानी पीड़ित ने घूस देने से साफ इनकार कर दिया, तो दारोगा ने अंचल निरीक्षक रघुनाथ प्रसाद के साथ सांठगांठ कर ली। इन अधिकारियों ने बिना किसी मेडिकल रिपोर्ट या उचित सबूत के, हत्या के प्रयास (धारा-109 बीएनएस) जैसी गंभीर धारा में केस को सत्य बताते हुए घटना के लगभग 11 महीने बाद पीड़ित रिशु राज को ही जेल भेज दिया और कोर्ट में चार्जशीट भी दाखिल कर दी।
आईजी की अदालत में खुला गंभीर फर्जीवाड़ा
जब यह अन्यायपूर्ण मामला आईजी विकास वैभव के सामने पहुंचा, तो उन्होंने 9 जून 2026 को खुद गया मुख्यालय में दोनों पक्षों और संबंधित पुलिस अधिकारियों को तलब कर मामले की फाइल खोल दी। आईजी की इस गहन समीक्षा में जो सच सामने आया, उसने पुलिसिया कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जांच में यह पाया गया कि जिस वादी अतुल आनंद के कोर्ट परिवाद पर रिशु को जेल भेजा गया, उसे समीक्षा के दिन तक यह भनक भी नहीं थी कि थाने में उसके नाम से कोई FIR दर्ज हो चुकी है। इससे यह साफ हो गया कि अनुसंधानकर्ता घर बैठे ही केस डायरी में गवाहों के फर्जी बयान दर्ज कर रहे थे। वहीं दूसरी ओर, अंचल निरीक्षक (CI) रघुनाथ प्रसाद ने 9 महीने बीत जाने के बाद भी घटनास्थल का रुख तक नहीं किया और दफ्तर में बैठकर ही पीड़ित को गिरफ्तार करने का फरमान सुना दिया। कानूनन धारा-109 BNS के तहत मामला सत्य करने के लिए जख्म जांच प्रतिवेदन होना अनिवार्य है, लेकिन बिना किसी मेडिकल रिपोर्ट के सीधे जेल भेजकर मनमानेपन की पराकाष्ठा पार की गई।
‘जीरो टॉलरेंस’ का हंटर: नपेंगे तत्कालीन थानेदार भी
आईजी विकास वैभव ने इस घोर लापरवाही, स्वेच्छाचारिता और संदिग्ध आचरण को देखते हुए अंचल निरीक्षक रघुनाथ प्रसाद और अनुसंधानकर्ता श्रीकान्त सिन्हा को सस्पेंड कर केवल सामान्य जीवन यापन भत्ते पर डाल दिया है और उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने के आदेश दे दिए हैं। इसके साथ ही आईजी ने जहानाबाद एसपी को निर्देश दिया है कि तत्कालीन थानाध्यक्ष दिवाकर विश्वकर्मा की भूमिका की भी कड़ी जांच की जाए कि उन्होंने पीड़ित रिशु राज का केस समय पर दर्ज क्यों नहीं किया था, ताकि दोषी पाए जाने पर उन पर भी सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सके।
आईजी विकास वैभव का कड़ा संदेश
मामले पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए पुलिस महानिरीक्षक ने साफ कहा है कि अनुसंधान में लापरवाही, पक्षपात अथवा विधि-विरुद्ध कार्यवाही किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं होगी तथा दोषी पदाधिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी। चौबीस घंटे के भीतर दो अलग-अलग जिलों के पुलिस अफसरों पर आईजी का यह हंटर यह बताने के लिए काफी है कि मगध रेंज में अब कानून का राज चलेगा और रक्षक बनकर भक्षक बनने वालों को कतई बख्शा नहीं जाएगा।







