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बिहार के लेनिन’ बाबू जगदेव प्रसाद की बायोपिक 29 मई को सिनेमाघरों में होगी रिलीज, दो सौ कलाकारों ने जीवंत किए इतिहास के पन्ने

On: Monday, May 18, 2026 10:09 AM

मगध लाइव डेस्क । बिहार की राजनीति के इतिहास में शोषितों, वंचितों और पिछड़ों की आवाज बुलंद करने वाले अमर शहीद जगदेव प्रसाद की जीवनी अब बड़े पर्दे पर नजर आने वाली है। उनकी प्रेरणादायी और संघर्षपूर्ण जीवन पर आधारित बायोपिक फिल्म ‘द इंडियन लेनिन बाबू जगदेव’ आगामी 29 मई को देश भर के सिनेमाघरों में रिलीज होने के लिए पूरी तरह तैयार है। नेक्सजेन हूमन फिल्म्स के बैनर तले बनी इस फिल्म का निर्देशन जाने-माने निर्देशक प्रेम कुमार विद्यार्थी ने किया है। करीब दो करोड़ रुपये के बजट से निर्मित यह फिल्म न सिर्फ वैचारिक रूप से समृद्ध है, बल्कि इसमें क्षेत्रीय सिनेमा की संभावनाओं को भी एक नया आयाम दिया गया है।

90 फीसदी शोषितों की लड़ाई और ‘बिहार के लेनिन’ बनने की कहानी

फिल्म के संबंध में मगध लाइव से विस्तृत जानकारी साझा करते हुए निर्देशक प्रेम कुमार विद्यार्थी ने बताया कि जगदेव बाबू बिहार की राजनीति में एक सर्वमान्य और कद्दावर नेता के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने आजीवन दलितों, पिछड़ों, अतिपिछड़ों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों समेत समाज के 90 प्रतिशत शोषित वर्ग के हक और अधिकारों के लिए संघर्ष किया। अंततः शोषितों के न्याय की इसी लड़ाई को लड़ते हुए वे कुर्था में शहीद हो गए थे।
रूस के महान क्रांतिकारी व्लादिमीर लेनिन, जिन्होंने 1917 की बोल्शेविक क्रांति के जरिए जार के क्रूर शासन को समाप्त कर श्रमिकों और किसानों के समाजवाद का सपना साकार किया था, ठीक उसी तर्ज पर जगदेव बाबू ने बिहार की राजनीति में 100 में 90 के अधिकार का फॉर्मूला देकर एक बड़ा वैचारिक भूचाल ला दिया था। यही कारण है कि जनता ने उन्हें ‘बिहार का लेनिन’ और ‘भारत का लेनिन’ की संज्ञा दी। फिल्म का शीर्षक ‘द इंडियन लेनिन बाबू जगदेव’ इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से प्रेरित है।

जमीनी स्तर पर हुई शूटिंग, 1932 से 1974 तक का इतिहास होगा जीवंत

फिल्म की प्रामाणिकता को बनाए रखने के लिए इसकी शूटिंग वास्तविक लोकेशंस पर की गई है। 2 फरवरी 2023 से शुरू हुई इस फिल्म की शूटिंग जगदेव बाबू के पैतृक गांव कुरहारी (जहानाबाद) के साथ-साथ गया जिले के डुमरिया, इमामगंज, बांकेबाजार और झारखंड के कई ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में की गई है।
यह फिल्म मुख्य रूप से वर्ष 1932 से लेकर 1974 तक की अवधि को समेटती है, जिसमें जगदेव बाबू के बचपन, उनके पारिवारिक परिवेश, ग्रामीण संस्कृति और तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों को बेहद संजीदगी से फिल्माया गया है। फिल्म में समाज में व्याप्त ऊंच-नीच, छुआछूत, ढोंग-आडंबर, अंधविश्वास, पंचकठिया प्रथा, वोट चोरी और ब्राह्मणवाद जैसी कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया गया है। साथ ही अमीरी-गरीबी के फासले और ओछी बनाम अच्छी राजनीति के अंतर्विरोधों को भी प्रमुखता से दिखाया गया है।

राजनीतिक रिकॉर्ड और कालजयी संवादों का समावेस

बाबू जगदेव प्रसाद के राजनीतिक कौशल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके दौर में मात्र दो वर्ष के भीतर छह बार सरकार गिरने और बनने का रिकॉर्ड दर्ज हुआ था। आज भी बिहार और देश के अन्य राज्यों में राजनीति के शीर्ष पर बैठे कई नेता उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं। फिल्म निर्माताओं के अनुसार, फिल्म में कई ऐसे दमदार और ऐतिहासिक संवाद (डायलॉग्स) शामिल हैं, जो न सिर्फ गलियों और चौराहों पर गूंजते रहे हैं, बल्कि बिहार विधानसभा से लेकर देश की संसद तक में अपनी धमक दिखा चुके हैं।

80 प्रतिशत स्थानीय कलाकारों को मौका, बॉलीवुड-लॉलीवुड का अनूठा संगम

इस बायोपिक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें ‘लोकल फॉर वोकल’ की तर्ज पर फिल्म निर्माण समिति के निर्णय के अनुसार 80 प्रतिशत स्थानीय कलाकारों को अभिनय का मौका दिया गया है। बिहार और झारखंड के करीब 200 से अधिक कलाकारों ने इसमें अलग-अलग महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं, जिनमें से कई कलाकार पहली बार बड़े पर्दे पर नजर आएंगे। इसके अलावा मुख्य भूमिकाओं में मुंबई, दिल्ली, कश्मीर, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल के मंझे हुए कलाकारों ने काम किया है।
फिल्म की मुख्य टीम इस प्रकार है:

  • निर्माता व सह-निर्माता: सिद्धार्थ कुमार (प्रोड्यूसर), विद्या विवेक, सुभाष दांगी, मनोरंजन कुमार, राजेश कुमार, राजीव कुमार, डॉ. नरेश कुमार, डॉ. जेपी सिंह, रणधीर कुमार (सह-निर्माता)।
  • लाइन प्रोड्यूसर: डॉ. संजीव कुमार, डॉ. जे.पी. सिंह, ई. अमरेन्द्र दांगी, कामता प्रसाद, अनिल कुशवाहा, सुनीता मौर्य।
  • प्रमुख कलाकार: विशाक मोहन शर्मा, सचिन तिवारी, अदविका, पिंकी देवी, नमन शर्मा, सरोज कुमार, अनिल पाली, ओमैर, इमरान अली, विपू दांगी, अमरनाथ पाठक, अशोक कुमार तांती और अन्य स्थानीय कलाकार।
  • लेखन व निर्देशन: अतुल मौर्य एवं पी.के. विद्यार्थी (लेखक), प्रेम कुमार विद्यार्थी (निर्देशक), समीर खान (सुपरवाइजिंग डायरेक्टर)।
  • तकनीकी व संगीत टीम: आमरत्य ऋषि और रौशन कुमार (डीओपी), अतीक अलाहाबादी, धनंजय भट्ट (गीत), शवाब आजमी (संगीत), हरमन नाजीर और अदिति पान (गीतकार)।

सिनेमाघरों से लेकर ओटीटी तक, हर वर्ग को बांधे रखेगी फिल्म

निर्देशक प्रेम कुमार विद्यार्थी ने भरोसा जताया कि यह फिल्म दर्शकों के साथ-साथ सिनेमाहॉल और ओटीटी (OTT) संचालकों की कसौटी पर भी खरी उतरेगी। फिल्म में सस्पेंस, रहस्य, मार-धाड़ (एक्शन), गंवई संस्कृति, पारंपरिक पहनावा-ओढ़ावा, बोलचाल और लोक सभ्यता का ऐसा बेहतरीन ताना-बाना बुना गया है कि दर्शक एक मिनट के लिए भी बोरियत महसूस नहीं करेंगे। यह फिल्म युवाओं, महिलाओं, किसानों, बेरोजगारों और राजनीति से जुड़े लोगों की भावनाओं को सीधे छुएगी।
फिल्म समीक्षकों का मानना है कि बिहार में फिल्म इंडस्ट्री के लिए संसाधनों का भले ही अभाव हो, लेकिन ऐसी ऐतिहासिक और वैचारिक बायोपिक्स के जरिए क्षेत्रीय सिनेमा में असीम संभावनाएं छिपी हुई हैं। बहरहाल, 29 मई को रिलीज होने जा रही यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर क्या कमाल दिखाती है, इस पर पूरे राजनीतिक और सिनेमा जगत की निगाहें टिकी हुई हैं।

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