मदर टेरेसा और बापू के संकल्प को सांसों में समेटे हुए हैं पूर्व वार्ड पार्षद; जो हाथ समाज छूने से डरता है, उन घावों पर खुद लगाते हैं मरहम; अंतिम सफर में बनते हैं बेसहारा शवों का सहारा
गया। आज की इस भागती-दौड़ती दुनिया में जहां इंसानियत चंद रिश्तों और स्वार्थों तक सिमट कर रह गई है, वहीं बिहार के गयाजी शहर की मिट्टी में एक ऐसी शख्सियत सांस ले रही है जो समाज के सबसे उपेक्षित और दर्द से कराहते लोगों के लिए उम्मीद की आखिरी किरण है। यह कहानी गयाजी के पूर्व वार्ड पार्षद डॉ. विनोद कुमार मंडल की है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन उन कुष्ठ रोगियों के आंसू पोंछने, उन्हें गले लगाने और उनके खोए हुए आत्मसम्मान को वापस दिलाने में झोंक दिया है, जिन्हें अक्सर हमारा सभ्य समाज देखने से भी कतरा जाता है।
भीतर सुलगती करुणा की वो आग और युवावस्था की वो कसम

डॉ. विनोद कुमार मंडल का यह सफर कोई अचानक शुरू हुआ प्रयास नहीं है, बल्कि यह एक तपस्या है जिसकी शुरुआत उनके भीतर युवावस्था में ही हो गई थी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की सेवा भावना और मदर टेरेसा की असीम करुणा से प्रेरित होकर डॉ. मंडल ने उस उम्र में एक संकल्प लिया था, जब आम युवा अपने सुनहरे भविष्य और ऐश-ओ-आराम के सपने बुनते हैं। उन्होंने खुद से वादा किया था कि जब तक उनके शरीर में आखिरी सांस रहेगी, वे देश के कुष्ठ रोगियों के अधिकारों के लिए लड़ेंगे और उनकी सेवा में खुद को समर्पित रखेंगे। आज दशकों बाद भी उनके चेहरे की झुर्रियों के पीछे वही पुराना और पक्का इरादा चमकता दिखाई देता है।
भ्रांतियों की दीवारें तोड़कर बनाया दिल का रिश्ता

हम आज भले ही इक्कीसवीं सदी में जी रहे हों, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि कुष्ठ रोग को लेकर समाज के मन में आज भी कई भ्रांतियां और गहरा सामाजिक भेदभाव छिपा हुआ है। लोग इन मरीजों के पास जाने से भी कतराते हैं। लेकिन डॉ. मंडल ने इस सामाजिक दूरी को हमेशा के लिए पाट दिया। उनका इन रोगियों से रिश्ता केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता या नेता का नहीं है, बल्कि एक आत्मीय परिवार का है। उनके साथ जमीन पर बैठना, उनकी तकलीफों को अपनी आंखों से देखना और उनके सूने जीवन में हंसी के कुछ पल बिखेरना डॉ. मंडल की जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। हद तो यह है कि वे इन मरीजों के हाथों से बना भोजन भी पूरे चाव और सम्मान के साथ खाते हैं, जो समाज के मुंह पर एक करारा तमाचा है।
घावों पर मरहम और बेसहारा कंधों को सहारा
डॉ. मंडल की सेवा का अंदाज़ देखकर किसी की भी आंखें नम हो सकती हैं। वे केवल मंचों से भाषण नहीं देते या सिर्फ सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं काटते, बल्कि वे खुद इन रोगियों के पास बैठकर उनके बहते हुए घावों को साफ करते हैं, उन पर अपने हाथों से मरहम-पट्टी लगाते हैं और उनके इलाज का पूरा खर्च निःस्वार्थ भाव से उठाते हैं। यही वजह है कि आज सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने से आए कुष्ठ रोगी उन्हें सिर्फ एक इंसान नहीं, बल्कि भगवान का भेजा हुआ दूत मानते हैं। मरीजों का कहना है कि आज उन्हें समाज में जो थोड़ा-बहुत सिर उठाकर जीने का हक मिला है या जो सरकारी राशन और आवास की सुविधाएं मिल रही हैं, वह डॉ. मंडल के सालों के संघर्ष और आंसुओं की बदौलत ही संभव हो पाया है।
अधिकारों की रक्षा के लिए एकीकृत बिहार से अब तक का संघर्ष
डॉ. मंडल का हौसला और उनकी आवाज सिर्फ गया की सीमाओं तक सीमित नहीं रही। जब झारखंड अलग राज्य नहीं बना था और बिहार एक था, तब भी वे ‘बिहार राज्य कुष्ठ कल्याण समिति’ के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में इन मजलूमों की आवाज बने हुए थे। राज्य के बंटवारे के बाद भी उनकी निष्ठा नहीं बदली और वे आज भी बिहार प्रदेश अध्यक्ष के रूप में इस वर्ग के हक की लड़ाई पूरी मजबूती से लड़ रहे हैं। देश के अलग-अलग कोनों में बने कुष्ठ आश्रमों की बदहाली को देखना और वहां के लोगों के पुनर्वास, शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दों को सरकार के कानों तक पहुंचाना उनकी रोज़ की आदत बन चुकी है।
गौतम बुद्ध कुष्ठ आश्रम को बचाने का आखिरी मोर्चा

इस समय डॉ. विनोद कुमार मंडल अपना पूरा ध्यान गया के ऐतिहासिक ‘गौतम बुद्ध कुष्ठ आश्रम एवं अस्पताल’ को बचाने और संवारने में लगा रहे हैं। वे इस बात को लेकर बेहद संवेदनशील हैं कि आश्रम की जमीन या वहां रह रहे लाचार मरीजों के किसी भी अधिकार पर कोई आंच न आए। वे दिन-रात प्रशासनिक गलियारों में इस बात के लिए पैरवी कर रहे हैं कि इस संस्थान को आधुनिक सुविधाएं मिलें ताकि यहां रहने वाले हर एक पीड़ित को एक गरिमापूर्ण और मुकम्मल जिंदगी नसीब हो सके।
इंसानियत का सबसे मार्मिक और रूह कंपा देने वाला रूप
इस पूरी कहानी का सबसे भावुक और इंसानियत को झकझोर देने वाला पहलू वो है, जिसे सुनकर किसी का भी कलेजा कांप उठे। डॉ. मंडल केवल जीवित रहते तक ही इन बदनसीबों का साथ नहीं निभाते, बल्कि उनके जाने के बाद भी उनका हाथ थामे रहते हैं। जब किसी कुष्ठ रोगी की मौत हो जाती है, तो संक्रमण के डर से या सामाजिक लोकलाज के भय से सगे संबंधी भी पीछे हट जाते हैं। ऐसे सन्नाटे में डॉ. विनोद कुमार मंडल आगे आते हैं, उस लावारिस और बेसहारा शव को अपने मजबूत कांधों पर उठाते हैं और नम आंखों से श्मशान घाट ले जाकर पूरे विधि-विधान से उनका अंतिम संस्कार करते हैं।
आज के इस दौर में, जहां मानवीय मूल्य दम तोड़ रहे हैं, डॉ. विनोद कुमार मंडल का यह त्यागमय जीवन समाज के लिए एक जलती हुई मशाल की तरह है, जो हमें याद दिलाती है कि दुनिया में इंसानियत से बड़ा और कोई धर्म नहीं होता।







