विशेष रिपोर्ट
सरकार भले ही गरीबों को सुलभ राशन मुहैया कराने के बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन हकीकत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) अब एक गंभीर ‘बीमारी’ का शिकार हो चुकी है। फेयर प्राइस डीलर एसोसिएशन की मानें तो राशन दुकानों का सर्वर और नेटवर्क फेल होना अब महज एक तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि ‘कैंसर’ का रूप ले चुका है। इस लाइलाज बीमारी की सबसे भारी कीमत वो गरीब मजदूर चुका रहे हैं, जिन्हें महज 5 किलो अनाज के लिए अपनी दिन भर की दिहाड़ी गंवानी पड़ रही है।
दोहरी मार: न खेत की मजदूरी, न पेट का अनाज
अभी बिहार में धान रोपाई का पीक सीजन चल रहा है। ऐसे में खेतों में काम करने वाले मजदूर किसानी का काम छोड़कर राशन दुकानों के बाहर घंटों लाइन में लगने को मजबूर हैं। विडंबना यह है कि घंटों इंतजार के बाद उन्हें पता चलता है कि ‘सर्वर डाउन’ है। इससे गरीबों को दोहरा झटका लग रहा है—एक तरफ खेत में काम न करने से उनकी दिन भर की मजदूरी मारी जा रही है, तो दूसरी तरफ घंटों लाइन में लगने के बावजूद राशन नसीब नहीं हो रहा है।
छत पर नेटवर्क तलाशते डीलर, सिस्टम हुआ फेल
सिर्फ लाभुक ही नहीं, राशन डीलर (विक्रेता) भी इस चरमराई हुई व्यवस्था से त्रस्त हैं। डीलर दिन भर ई-पॉस (e-PoS) मशीन लेकर कभी दुकान के बाहर तो कभी छत के ऊपर नेटवर्क और सिग्नल तलाशते नजर आते हैं। डीलर इसी जद्दोजहद में रहते हैं कि किसी तरह ‘लिंक’ आ जाए और लाभुक का अंगूठा (बायोमेट्रिक) काम कर जाए ताकि उसे राशन दिया जा सके।
एसोसिएशन के मुताबिक, यह समस्या पिछले महीने से लगातार बनी हुई है। अगस्त माह में मात्र दो दिन यह सिस्टम थोड़ा ठीक चला, उसके बाद से पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है।
अधिकारियों का रवैया: “कैंसर का मरीज जैसे मुंबई रेफर होता है, वैसे ही सर्वर समस्या हैदराबाद”
जब डीलर संघ अपनी शिकायत लेकर अधिकारियों के पास पहुंचता है, तो उन्हें सिर्फ एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर के चक्कर कटवाए जाते हैं। एसोसिएशन का कहना है कि जिस तरह कैंसर के गंभीर मरीज को इलाज के लिए मुंबई भेज दिया जाता है, ठीक उसी तरह स्थानीय अधिकारी सर्वर की इस समस्या का ठीकरा ‘हैदराबाद’ (मुख्य सर्वर) के सिर फोड़कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं।
- हेल्पलाइन है, लेकिन हेल्प नहीं: सरकार के सारे हेल्पलाइन नंबर सफेद हाथी साबित हो रहे हैं, जिन पर कोई सुनवाई नहीं हो रही है।
- लगातार गुहार, नतीजा सिफर: एसोसिएशन लगातार विभाग से गुहार लगा रहा है, लेकिन अब तक कोई ठोस परिणाम नहीं निकला है।
सड़कों पर फूट सकता है जनाक्रोश
अधिकारियों की इस टालमटोल और सिस्टम की नाकामी का सीधा असर जमीनी स्तर पर दिख रहा है। राशन न मिलने से परेशान लाभुकों का गुस्सा अब डीलरों पर फूट रहा है और वे उनके सिर चढ़ रहे हैं। डीलर एसोसिएशन ने चेतावनी दी है कि विक्रेता और लाभुक दोनों का आक्रोश अब चरम पर है। भूखे पेट और खाली हाथ लौट रहे लोगों का धैर्य जवाब दे रहा है और यदि जल्द ही इस ‘सर्वर रुपी कैंसर’ का इलाज नहीं किया गया, तो कभी भी यह विरोध सड़कों पर एक बड़े आंदोलन के रूप में फूट सकता है।









