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अब भूखे नहीं सोएंगे घनश्याम के पोते-पोतियां: दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर बुजुर्ग के घर पहुँची संत रामपाल जी महाराज की ‘अन्नपूर्णा मुहिम’, मिलेगा जीवनभर का सहारा

On: Thursday, January 22, 2026 3:59 PM

रिपोर्ट: दीपक कुमार

मगध लाइव न्यूज़ | सुरसंड (सीतामढ़ी)
जिले के सुरसंड प्रखंड के राधौर गांव में आज मानवता की एक ऐसी मिसाल पेश की गई, जिसने न केवल ग्रामीणों की आँखें नम कर दीं, बल्कि समाज के सामने ‘सेवा ही परमो धर्म’ का उदाहरण भी रखा। पिछले पांच वर्षों से घोर दरिद्रता और अपनों के वियोग का दंश झेल रहे 60 वर्षीय घनश्याम महतो और उनके तीन मासूम पोते-पोतियों के जीवन में आज खुशियों ने दस्तक दी। हरियाणा के मुनींद्र धर्माथ ट्रस्ट (संत रामपाल जी महाराज) ने इस परिवार की बदहाली को देखते हुए उन्हें गोद ले लिया है।

दुखों का पहाड़: माँ छोड़कर चली गई, पिता तलाश में लापता हुए

इस परिवार की त्रासदी 5 साल पहले शुरू हुई थी। घनश्याम महतो के पुत्र रामबाबू महतो और बहू ममता देवी दिल्ली में मजदूरी करते थे। लेकिन अचानक ममता देवी अपने डेढ़ साल के दुधमुंहे बच्चे सहित पूरे परिवार को छोड़कर कहीं चली गई। पत्नी के वियोग में रामबाबू की मानसिक स्थिति बिगड़ गई। वह अपने तीनों बच्चों—खुशबू (9 वर्ष), सूरज (7 वर्ष) और देवराज (5 वर्ष) को गाँव में अपने बूढ़े पिता के पास छोड़ पत्नी की तलाश में निकला, लेकिन वह भी फिर कभी लौटकर नहीं आया।

झोपड़ी में मुफ़लिसी: 100 रुपये की दिहाड़ी और भूख से जंग

60 साल के बुजुर्ग दादा घनश्याम महतो के कंधों पर तीन मासूमों की जिम्मेदारी आ गई। रहने को बांस की जर्जर झोपड़ी, न पंखा, न मच्छरदानी। दादा कभी मजदूरी करते तो कभी ‘हवा मिठाई’ बेचकर 100-200 रुपये जुटाते, ताकि बच्चों का पेट भर सकें। कई बार काम न मिलने पर पूरा परिवार भूखे पेट सोने को मजबूर था। पड़ोसियों की दया पर इन मासूमों का बचपन सिसक रहा था।

देवदूत बनकर पहुँचे अनुयायी: राशन से लेकर कपड़ों तक की मदद

अन्नपूर्णा मुहिम
सभी सामग्री और परिवार

गुरुवार की सुबह राधौर गांव की उस संकरी गली में जब गाड़ियों का काफिला रुका, तो किसी को अंदाजा नहीं था कि ये गाड़ियाँ खुशियों का सौगात लेकर आई हैं। ‘अन्नपूर्णा मुहिम’ के तहत जब संत रामपाल जी महाराज के अनुयायी सामग्री लेकर उस जर्जर झोपड़ी के सामने पहुँचे, तो घनश्याम महतो की पथराई आँखों में उम्मीद की चमक कौंध गई।

जब झोली खुशियों से भर गई:

जैसे ही सेवादारों ने राशन के पैकेट खोलने शुरू किए, नजारा भावुक कर देने वाला था। चावल, तीन प्रकार की दालें, आलू-प्याज, मसाले, तेल, दूध और चीनी जैसे सभी जरूरी सामानों का अंबार लग गया। मासूम खुशबू, सूरज और देवराज, जिन्होंने शायद ही कभी अपनी झोपड़ी में इतना सामान एक साथ देखा था, फटी आँखों से यह सब निहार रहे थे।

ठिठुरती रातों को मिला सुकून

कड़कड़ाती ठंड में जहाँ ये बच्चे बिना गर्म कपड़ों के ठिठुरने को मजबूर थे, वहां उन्हें दो-दो जोड़ी नए वस्त्र और उच्च गुणवत्ता वाले जैकेट, स्वेटर, टोपी और कंबल प्रदान किए गए। सेवादारों ने अपने हाथों से जब बच्चों को नए जैकेट पहनाए, तो बच्चों के चेहरों पर जो मुस्कान आई, उसने वहाँ मौजूद हर ग्रामीण का दिल जीत लिया। घर में न पंखा था न मच्छरदानी, ट्रस्ट ने उन बुनियादी जरूरतों का भी ख्याल रखा और बर्तन सहित अन्य जरूरी घरेलू सामान भी उपलब्ध कराए।

अब पिता की कमी महसूस नहीं होने देंगे

सीतामढ़ी जिला सेवादार सुशील दास ने इस भावुक क्षण में कहा, “जब गुरुदेव (संत रामपाल जी महाराज) तक इस परिवार की रिपोर्ट पहुँची, तो उन्होंने एक ही बात कही—’इन बच्चों को महसूस नहीं होना चाहिए कि इनका कोई सहारा नहीं है’।” उन्होंने घोषणा की कि यह मदद केवल आज की नहीं है, बल्कि अब यह परिवार पूरी तरह से ट्रस्ट के संरक्षण में है। हर महीने इसी तरह राशन और जरूरत का सामान उनके घर तक पहुँचाया जाएगा ताकि दादा घनश्याम महतो को उम्र के इस पड़ाव में मजदूरी के लिए भटकना न पड़े।

आँखों से छलक पड़े दादा के आँसू

मदद पाकर घनश्याम महतो अपने आँसू नहीं रोक पाए। उन्होंने रूंधे गले से कहा, “मैंने तो मान लिया था कि हम ऐसे ही घुट-घुट कर मर जाएंगे, लेकिन आज साक्षात भगवान ने हमारे द्वार पर दस्तक दी है। अब मेरे पोते-पोतियां कम से कम भूखे पेट तो नहीं सोएंगे।”

ग्रामीणों ने कहा- ‘आज साक्षात भगवान आए हैं’

वहीं गांव की एक बुजुर्ग महिला ने बच्चों के लिए नए कपड़े को देख कर कहा कि इन मासूमों के सिर से 5 साल पहले जो साया हटा था, आज वह वापस लौट आया है। ग्रामीणों ने एक स्वर में कहा कि जिस तरह से ट्रस्ट ने इस परिवार को गोद लेने और हर महीने राशन देने का संकल्प लिया है, उससे यह स्पष्ट है कि अब इन अनाथ जैसे बच्चों का भविष्य सुरक्षित है।

समाज के लिए एक बड़ी नजीर

अन्नपूर्णा मुहिम: 60वर्षीय घनश्याम महतो और उनके पोते पोती
60वर्षीय घनश्याम महतो और उनके पोते पोती

सीतामढ़ी के इस छोटे से गांव में आज हुई इस घटना ने पूरे जिले में चर्चा छेड़ दी है। ग्रामीणों का कहना है कि जब सरकार और स्थानीय प्रशासन की योजनाएं इस टूटी झोपड़ी तक नहीं पहुँच पाईं, तब एक संत के शिष्यों ने यहाँ पहुँचकर यह साबित कर दिया कि मानवता की सेवा ही सबसे बड़ी भक्ति है।

अब घनश्याम महतो को 100 रुपये की दिहाड़ी के लिए बीमार शरीर के साथ भटकना नहीं होगा। उनके पोते सूरज, देवराज और पोती खुशबू के चेहरे की मुस्कान आज इस बात की गवाह थी कि उनके जीवन की काली रात अब छंट चुकी है।

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