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DPDP कानून क्या है? क्या अब भ्रष्टाचार की खबर लिखने से पहले पत्रकारों को लेनी होगी अनुमति? सुप्रीम कोर्ट पहुंचा विवाद

On: Thursday, October 29, 2026 2:35 AM

डिजिटल निजता की सुरक्षा के लिए बने कानून पर पत्रकार संगठनों की आपत्ति, 21 बड़े मीडिया संस्थानों का प्रतिनिधित्व करने वाली DNPA ने दी चुनौती; RTI के अधिकार और खोजी पत्रकारिता के भविष्य पर उठे सवाल


नई दिल्ली। देश में डिजिटल व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा के उद्देश्य से बनाया गया एक कानून इन दिनों पत्रकारिता, मीडिया संस्थानों और सूचना के अधिकार को लेकर बड़ी बहस का विषय बना हुआ है। इस कानून का नाम है डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (Digital Personal Data Protection Act), 2023 यानी DPDP Act।

सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य आम नागरिकों की निजी जानकारी को सुरक्षित रखना और डिजिटल माध्यमों पर उसके दुरुपयोग को रोकना है। लेकिन पत्रकार संगठनों, आरटीआई कार्यकर्ताओं और खोजी पत्रकारों की चिंता है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से भ्रष्टाचार, सरकारी अनियमितताओं और सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों से जुड़ी खबरों की पड़ताल मुश्किल हो सकती है।

इस विवाद ने उस समय नया मोड़ लिया, जब 27 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। संगठन ने कानून के कई प्रावधानों और 2025 में बनाए गए नियमों को चुनौती दी है। अदालत ने तत्काल अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया, लेकिन केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को निर्धारित है।

सवाल यह है कि आखिर यह कानून है क्या? इसमें ऐसे कौन से प्रावधान हैं जिनसे पत्रकारों को परेशानी हो सकती है? क्या किसी भ्रष्ट अधिकारी के खिलाफ खबर प्रकाशित करने से पहले उसकी अनुमति लेनी पड़ेगी? क्या कोई व्यक्ति अपनी पुरानी खबर हटवाने की मांग कर सकता है? और क्या इस कानून से आरटीआई के जरिए सरकारी अधिकारियों की संपत्ति या कामकाज से जुड़ी जानकारी हासिल करना कठिन हो जाएगा? आइए, पूरे मामले को आसान भाषा और उदाहरणों के जरिए समझते हैं।

1. सबसे पहले समझिए DPDP Act क्या है?

DPDP का पूरा नाम Digital Personal Data Protection है। हिंदी में इसे डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून कहा जा सकता है।

यह कानून 11 अगस्त 2023 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद संसद से पारित अधिनियम बना। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति की डिजिटल व्यक्तिगत जानकारी के संग्रह, इस्तेमाल, भंडारण और साझा करने को नियंत्रित करना है।

उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति किसी वेबसाइट पर अपना मोबाइल नंबर, ईमेल, पता, आधार से जुड़ी जानकारी या अन्य निजी विवरण देता है, तो उस जानकारी का इस्तेमाल कैसे होगा, इसे लेकर कानून जिम्मेदारियां तय करता है।

मान लीजिए कोई व्यक्ति ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट पर अपना मोबाइल नंबर और पता देता है। वेबसाइट उस जानकारी का इस्तेमाल सामान पहुंचाने के लिए कर सकती है। लेकिन उस जानकारी को बिना उचित आधार के किसी दूसरी कंपनी को बेच देना या किसी दूसरे उद्देश्य से इस्तेमाल करना कानून के दायरे में आ सकता है।

इसी तरह कोई अस्पताल, बैंक, निजी कंपनी, मोबाइल ऐप या डिजिटल प्लेटफॉर्म लोगों की व्यक्तिगत जानकारी एकत्र करता है तो उस पर भी कानून के प्रावधान लागू हो सकते हैं।

इस कानून के तहत जिस व्यक्ति की जानकारी का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसे ‘Data Principal’ कहा गया है। वहीं जो संस्था या व्यक्ति यह तय करता है कि जानकारी क्यों और कैसे इस्तेमाल होगी, उसे ‘Data Fiduciary’ कहा जाता है।

2. इस कानून के मुख्य प्रावधान क्या हैं?

DPDP Act में कुल 44 धाराएं हैं। इसके साथ केंद्र सरकार ने 13 नवंबर 2025 को Digital Personal Data Protection Rules, 2025 भी अधिसूचित किए।

कानून और नियमों के कुछ प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं:

(क) व्यक्तिगत जानकारी इस्तेमाल करने से पहले सहमति

किसी व्यक्ति की डिजिटल व्यक्तिगत जानकारी का इस्तेमाल सामान्यतः उसकी स्वतंत्र, स्पष्ट और सूचित सहमति के आधार पर किया जाना चाहिए। कानून में कुछ वैध उपयोगों के लिए अलग प्रावधान भी हैं।

उदाहरण के तौर पर, आपने किसी मोबाइल ऐप पर अपना नंबर देकर खाता बनाया। ऐप को यह स्पष्ट करना होगा कि वह आपका नंबर किस उद्देश्य से इस्तेमाल कर रहा है। आप अपनी सहमति वापस भी ले सकते हैं।

(ख) जानकारी का इस्तेमाल तय उद्देश्य के लिए

किसी संस्था को जानकारी जिस उद्देश्य से दी गई है, उसका इस्तेमाल उसी वैध और घोषित उद्देश्य के अनुसार होना चाहिए।

उदाहरण के लिए, आपने किसी कंपनी को नौकरी के आवेदन के लिए अपना बायोडाटा दिया। कंपनी उस जानकारी का मनमाने ढंग से दूसरे व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकती।

(ग) व्यक्ति को अपनी जानकारी जानने का अधिकार

व्यक्ति यह जानने का अनुरोध कर सकता है कि किसी संस्था के पास उसकी कौन-कौन सी व्यक्तिगत जानकारी है और उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है।

(घ) जानकारी मिटाने का अधिकार

कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति अपनी सहमति वापस लेने या निर्धारित उद्देश्य पूरा होने के बाद अपनी व्यक्तिगत जानकारी मिटाने की मांग कर सकता है। हालांकि कानून में डेटा रखने से संबंधित वैधानिक अपवाद और अन्य दायित्व भी हैं।

(ङ) शिकायत और समाधान का अधिकार

यदि किसी संस्था ने व्यक्तिगत जानकारी का गलत इस्तेमाल किया है तो संबंधित व्यक्ति शिकायत कर सकता है। कानून के तहत डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड की व्यवस्था की गई है।

(च) बच्चों की जानकारी के लिए विशेष सुरक्षा

18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की व्यक्तिगत जानकारी के प्रसंस्करण के लिए सामान्यतः सत्यापन योग्य अभिभावकीय सहमति का प्रावधान है। बच्चों के डेटा के इस्तेमाल पर कुछ अतिरिक्त प्रतिबंध भी लगाए गए हैं।

(छ) डेटा लीक होने पर जिम्मेदारी

यदि किसी संस्था के पास रखी व्यक्तिगत जानकारी लीक होती है तो उसे प्रभावित व्यक्तियों और डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड को निर्धारित तरीके से सूचना देनी होगी।

(ज) सरकार को कुछ परिस्थितियों में छूट

कानून की धारा 17 में कुछ विशेष परिस्थितियों में छूट का प्रावधान है। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून प्रवर्तन और अन्य निर्धारित उद्देश्यों से जुड़ी छूटें शामिल हैं। यही धारा पत्रकारिता से जुड़े विवाद में भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि समाचार प्रकाशन के लिए कोई व्यापक और स्पष्ट स्वतंत्र पत्रकारिता छूट इसमें नहीं दी गई है।

3. पत्रकारिता के लिए सबसे बड़ा विवाद क्या है?

इस कानून को लेकर पत्रकारों की मुख्य आपत्ति यह नहीं है कि नागरिकों की निजता सुरक्षित क्यों रखी जाए। निजता की सुरक्षा जरूरी है। विवाद इस बात को लेकर है कि जनहित में की जाने वाली पत्रकारिता को कानून के तहत स्पष्ट और प्रभावी संरक्षण क्यों नहीं दिया गया।

मान लीजिए किसी जिले में एक सरकारी अधिकारी पर आरोप है कि उसने सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के नाम पर करोड़ों रुपये का घोटाला किया है।

एक पत्रकार इस मामले की पड़ताल करता है। वह सरकारी दस्तावेज, लाभार्थियों की जानकारी, संपत्ति से जुड़े रिकॉर्ड और संबंधित लोगों के बयान जुटाता है।

अब पत्रकार को कई ऐसे व्यक्तिगत विवरण मिल सकते हैं जिनका संबंध उसकी जांच से है।

यदि रिपोर्टिंग के दौरान व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण पर DPDP Act के दायित्व लागू होते हैं, तो सहमति, जानकारी देने और डेटा मिटाने से जुड़े प्रावधान सवाल खड़े कर सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कानून में पत्रकारिता के लिए व्यापक स्पष्ट छूट नहीं है। ऐसे में पत्रकार संगठनों को आशंका है कि जनहित में की गई खोजी पत्रकारिता पर भी अनुपालन का दबाव पड़ सकता है।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हर खबर लिखने से पहले हर व्यक्ति की अनुमति लेना कानून ने अनिवार्य कर दिया है। कानून में वैध उपयोग के अलग आधार हैं और इसका वास्तविक इस्तेमाल मामले की परिस्थितियों तथा संबंधित प्रावधानों पर निर्भर करेगा।

4. भ्रष्टाचार की खबर लिखने से पहले आरोपी अधिकारी की अनुमति लेनी होगी?

यह इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।

मान लीजिए किसी पत्रकार को पता चलता है कि एक सरकारी अधिकारी ने अपनी आय से अधिक संपत्ति अर्जित की है। पत्रकार दस्तावेजों की जांच करता है, संबंधित विभाग से जानकारी मांगता है और खबर प्रकाशित करना चाहता है।

यदि पत्रकार को हर बार संबंधित अधिकारी से अनुमति लेनी पड़े, तो जांच की जानकारी पहले ही उस व्यक्ति तक पहुंच सकती है जिसके खिलाफ जांच चल रही है।

ऐसी स्थिति में संबंधित व्यक्ति दस्तावेज नष्ट कर सकता है, गवाहों को प्रभावित कर सकता है या जांच को बाधित करने की कोशिश कर सकता है।

इसी आशंका को DNPA और अन्य याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा है।

लेकिन यहां कानूनी स्थिति को समझना जरूरी है। DPDP Act में यह नहीं लिखा है कि भ्रष्टाचार के आरोपी से खबर छापने की अनुमति लेना हर हाल में अनिवार्य है। विवाद यह है कि कानून की सहमति और डेटा संबंधी जिम्मेदारियां खोजी पत्रकारिता पर किस तरह लागू होंगी और क्या इसके लिए अलग छूट जरूरी है।

5. क्या कोई व्यक्ति अपनी खबर हटवा सकता है?

कानून की धारा 12 के तहत व्यक्ति को कुछ परिस्थितियों में अपनी व्यक्तिगत जानकारी मिटाने का अधिकार दिया गया है।

अब एक उदाहरण समझिए।

मान लीजिए किसी अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच हुई थी। एक समाचार पोर्टल ने उस मामले की तथ्यात्मक खबर प्रकाशित की। कुछ वर्षों बाद संबंधित व्यक्ति पोर्टल से संपर्क कर कहता है कि उसकी व्यक्तिगत जानकारी मिटाई जाए।

ऐसी स्थिति में सवाल उठ सकता है कि क्या खबर में मौजूद व्यक्तिगत जानकारी भी हटानी होगी?

पत्रकार संगठनों का कहना है कि यदि इस अधिकार का इस्तेमाल प्रकाशित खबरों को हटवाने के दबाव के रूप में किया गया, तो इससे समाचार अभिलेखों, पुरानी रिपोर्टों और जनहित की पत्रकारिता पर असर पड़ सकता है।

हालांकि यह भी समझना जरूरी है कि धारा 12 के तहत डेटा मिटाने का अधिकार असीमित नहीं है। जहां किसी कानून के तहत जानकारी रखना जरूरी है या किसी अन्य वैधानिक आधार पर उसे सुरक्षित रखना आवश्यक है, वहां अलग स्थिति हो सकती है। हर प्रकाशित खबर अपने आप हटाने योग्य नहीं हो जाती।

6. RTI कानून में क्या बदलाव किया गया और पत्रकारों को इसकी चिंता क्यों है?

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा DPDP Act की धारा 44(3) है।

इस धारा के माध्यम से सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) की धारा 8(1)(j) में बदलाव किया गया है।

पहले RTI कानून के तहत व्यक्तिगत जानकारी देने से इनकार किया जा सकता था, यदि उसका किसी सार्वजनिक गतिविधि या हित से संबंध नहीं था अथवा उसका खुलासा किसी व्यक्ति की निजता में अनुचित हस्तक्षेप करता था।

लेकिन पहले के प्रावधान में यह भी व्यवस्था थी कि यदि व्यापक जनहित सूचना के खुलासे को उचित ठहराता है, तो जानकारी दी जा सकती है।

DPDP Act के संशोधन के बाद धारा 8(1)(j) का नया पाठ है:

‘Information which relates to personal information.’

अर्थात ऐसी जानकारी जो व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित हो, उसे RTI के तहत छूट प्राप्त होगी।

यहीं से विवाद शुरू होता है।

एक उदाहरण से समझिए:

मान लीजिए किसी नागरिक ने RTI के माध्यम से किसी सरकारी अधिकारी की संपत्ति, सरकारी नियुक्ति, सार्वजनिक धन के इस्तेमाल या किसी सरकारी योजना में लाभार्थियों से जुड़ी जानकारी मांगी।

यदि मांगी गई जानकारी को व्यक्तिगत जानकारी माना जाता है, तो RTI अधिकारी उसके खुलासे से इनकार कर सकता है।

पहले बड़े जनहित के आधार पर ऐसी जानकारी के खुलासे की गुंजाइश थी। अब संशोधित प्रावधान को लेकर आशंका है कि जनहित और निजता के बीच संतुलन बनाने की पुरानी व्यवस्था कमजोर हो गई है।

इसका असर भ्रष्टाचार, सरकारी खर्च, सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही और सरकारी योजनाओं की निगरानी से जुड़ी सूचनाओं पर पड़ सकता है।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि RTI के तहत हर जानकारी बंद हो गई है। RTI Act की दूसरी धाराएं और अन्य वैधानिक प्रावधान अभी भी लागू हैं। विवाद खास तौर पर व्यक्तिगत जानकारी और उसके सार्वजनिक हित से संबंध को लेकर है।

7. क्या सरकार पत्रकारों और उनके गोपनीय सूत्रों की जानकारी मांग सकती है?

DPDP Act की धारा 36 और DPDP Rules, 2025 के नियम 23 को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

धारा 36 के तहत केंद्र सरकार निर्धारित उद्देश्यों के लिए डेटा फिड्यूशियरी से जानकारी मांग सकती है।

वहीं नियम 23 के तहत निर्धारित परिस्थितियों में सरकार किसी डेटा फिड्यूशियरी या इंटरमीडियरी से जानकारी मांग सकती है। कुछ परिस्थितियों में संबंधित संस्था को यह भी निर्देश दिया जा सकता है कि वह ऐसी मांग की जानकारी प्रभावित व्यक्ति या किसी अन्य व्यक्ति को न दे।

पत्रकार संगठनों की चिंता है कि यदि किसी मीडिया संस्थान के पास किसी खोजी खबर से संबंधित डिजिटल जानकारी, दस्तावेज या स्रोतों का रिकॉर्ड है, तो ऐसे प्रावधानों का इस्तेमाल गोपनीय सूत्रों की पहचान तक पहुंचने के लिए हो सकता है।

उदाहरण के लिए, किसी पत्रकार को सरकारी विभाग के भीतर से एक व्हिसलब्लोअर ने भ्रष्टाचार से संबंधित दस्तावेज दिए। यदि उस पत्रकार की डिजिटल बातचीत या दस्तावेजों की जानकारी किसी जांच के तहत मांगी जाती है, तो स्रोत की पहचान उजागर होने का खतरा पैदा हो सकता है।

यह याचिकाकर्ताओं की आशंका है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार को हर पत्रकार के फोन, ईमेल या स्रोतों की जानकारी बिना किसी शर्त के लेने का अधिकार मिल गया है।

8. क्या छोटे समाचार पोर्टल पर भी लागू होगा यह कानून?


यह सवाल स्वतंत्र डिजिटल समाचार संस्थानों के लिए भी महत्वपूर्ण है।

DPDP Act का दायरा डिजिटल व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण पर आधारित है। कानून में समाचार पोर्टल, छोटे डिजिटल मीडिया संस्थान या स्वतंत्र पत्रकारों के लिए कोई व्यापक सामान्य पत्रकारिता छूट स्पष्ट रूप से नहीं दी गई है।

इसलिए डिजिटल समाचार संस्थानों को इस बात पर ध्यान देना होगा कि वे पाठकों, कर्मचारियों, विज्ञापनदाताओं, स्रोतों और अन्य व्यक्तियों की व्यक्तिगत जानकारी कैसे एकत्र और इस्तेमाल करते हैं।

हालांकि किसी वेबसाइट पर केवल खबर प्रकाशित करना और उस खबर के लिए किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी को व्यवस्थित रूप से एकत्र या संसाधित करना एक ही कानूनी परिस्थिति नहीं है। कानून का वास्तविक अनुप्रयोग तथ्यों और संबंधित प्रावधानों पर निर्भर करेगा।

9. नियम तोड़ने पर कितना जुर्माना लग सकता है?

DPDP Act में भारी आर्थिक जुर्माने का प्रावधान है।

कानून की अनुसूची के अनुसार अलग-अलग उल्लंघनों के लिए अधिकतम जुर्माना इस प्रकार है:

– उचित सुरक्षा उपाय नहीं अपनाने पर 250 करोड़ रुपये तक।
– डेटा उल्लंघन की सूचना देने संबंधी दायित्वों का पालन नहीं करने पर 200 करोड़ रुपये तक।
– बच्चों से संबंधित विशेष दायित्वों का उल्लंघन करने पर 200 करोड़ रुपये तक।
– महत्वपूर्ण डेटा फिड्यूशियरी के अतिरिक्त दायित्वों का उल्लंघन करने पर 150 करोड़ रुपये तक।
– अन्य निर्धारित उल्लंघनों के लिए 50 करोड़ रुपये तक।

यह अधिकतम सीमा है, हर छोटी गलती पर स्वतः इतना जुर्माना नहीं लगता। डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड मामले की परिस्थितियों और कानून में निर्धारित कारकों के आधार पर निर्णय लेता है।

पत्रकार संगठनों का कहना है कि इतने भारी जुर्माने का डर छोटे और स्वतंत्र समाचार संस्थानों को संवेदनशील जनहित की खबरों से दूर कर सकता है।

10. कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट कौन-कौन पहुंचा है?

यह समझना जरूरी है कि इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में केवल एक याचिका नहीं है। इसके खिलाफ अलग-अलग समय पर नागरिक अधिकार संगठनों, RTI कार्यकर्ताओं, खोजी पत्रकारों और डिजिटल समाचार प्रकाशकों ने याचिकाएं दाखिल की हैं।

पहला मामला: Venkatesh Nayak और अन्य

Venkatesh Nayak, National Campaign for People’s Right to Information (NCPRI), The Reporters’ Collective और पत्रकार Nitin Sethi से जुड़े पक्षों ने कानून के प्रावधानों को चुनौती दी है।

इन याचिकाओं में RTI कानून में हुए बदलाव, सरकारी शक्तियों, डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संभावित प्रभाव जैसे मुद्दे उठाए गए हैं।

इस मामले में खास तौर पर यह सवाल है कि क्या व्यक्तिगत जानकारी के नाम पर सार्वजनिक हित की महत्वपूर्ण सूचनाओं को भी रोका जा सकता है।

दूसरा मामला: The Reporters’ Collective

यह खोजी पत्रकारिता से जुड़ा संगठन है। इसकी याचिका में यह चिंता जताई गई है कि कानून के प्रावधान भ्रष्टाचार की जांच, सरकारी योजनाओं की पड़ताल और पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं।

तीसरा मामला: Digital News Publishers Association (DNPA)

27 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में DNPA की याचिका पर सुनवाई हुई। DNPA देश के 21 बड़े समाचार संगठनों के डिजिटल मीडिया संस्थानों का प्रतिनिधित्व करता है।

इसमें शामिल प्रमुख मीडिया समूहों और संस्थानों में द इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदू, इंडिया टुडे, टाइम्स ग्रुप, जी मीडिया, NDTV और नेटवर्क18 जैसे नाम शामिल हैं।

DNPA के साथ स्वतंत्र खोजी पत्रकार Yukta Mudgal भी याचिकाकर्ता हैं।

इस याचिका में DPDP Act की नौ धाराओं और DPDP Rules, 2025 के तीन नियमों को चुनौती दी गई है।

DNPA ने धारा 7, 17(2), 18, 19, 27, 29, 36, 37 और 44(3) को चुनौती दी है। इसके साथ नियम 16, 17 और 23 पर भी सवाल उठाए हैं।

संगठन का कहना है कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से खोजी पत्रकारिता, प्रेस की स्वतंत्रता और समाचार संस्थानों के कामकाज पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि DNPA के 21 सदस्य मीडिया संस्थान एक ही संगठन के माध्यम से प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी 21 संस्थानों ने अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की हैं।

11. सुप्रीम कोर्ट ने अब तक क्या कहा है?

27 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे, ने DNPA की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।

DNPA की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने दलील दी कि पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से समाचार संस्थानों को जांच के विषय बने व्यक्तियों की सहमति लेने जैसी कानूनी जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है।

उन्होंने आशंका जताई कि इससे खबर प्रकाशित होने से पहले ही सेंसरशिप जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग को रोकने और मीडिया की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं से इस संबंध में सुरक्षा उपाय सुझाने की बात भी कही।

फिलहाल अदालत ने कानून पर अंतरिम रोक नहीं लगाई है। केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है। अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को होनी है।

12. सरकार का क्या पक्ष है?

सरकार का तर्क है कि DPDP Act का मुख्य उद्देश्य नागरिकों की निजता और व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा करना है।

सरकार इसे नागरिकों के डिजिटल अधिकारों को मजबूत करने वाला कानून बताती है। उसका कहना है कि व्यक्तिगत डेटा का दुरुपयोग रोकना आज के डिजिटल दौर की आवश्यकता है।

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भी कहा है कि कानून प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित करने के उद्देश्य से नहीं बनाया गया है। मीडिया संस्थानों की चिंताओं को लेकर सरकार की ओर से विचार और संभावित बदलावों के संकेत भी सामने आए हैं।

लेकिन इस मामले में अंतिम कानूनी स्थिति सुप्रीम कोर्ट के फैसले और सरकार के जवाब के बाद ही स्पष्ट होगी।

13. कानून कब से लागू होगा? क्या अभी से पत्रकारों पर कार्रवाई हो सकती है?

यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है जिसे समझना जरूरी है।

DPDP Act को 2023 में मंजूरी मिली थी, लेकिन इसकी सभी धाराएं एक साथ लागू नहीं की गईं। केंद्र सरकार ने 13 नवंबर 2025 को अलग-अलग प्रावधानों के लिए चरणबद्ध समयसीमा अधिसूचित की।

– 13 नवंबर 2025 से कुछ परिभाषाओं, डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड और संस्थागत प्रावधानों सहित कानून के कुछ हिस्से लागू हुए।
– 13 नवंबर 2026 से कुछ अतिरिक्त प्रावधान लागू होने निर्धारित हैं।
– 13 मई 2027 से कानून की अधिकांश मुख्य जिम्मेदारियां और अधिकार लागू होने निर्धारित हैं।

इसी तरह DPDP Rules, 2025 के नियम 1, 2 और 17 से 21 तत्काल लागू हुए। नियम 4 को एक साल बाद और नियम 3, 5 से 16 तथा 22 और 23 को 18 महीने बाद लागू होना निर्धारित किया गया है।

इसलिए 29 अक्टूबर 2026 की स्थिति में कानून के सभी मुख्य दायित्व अभी लागू नहीं हुए हैं। यह कहना गलत होगा कि इस कानून के तहत अभी से हर पत्रकार को खबर प्रकाशित करने के लिए अनुमति लेनी पड़ रही है।

14. असली सवाल: निजता की सुरक्षा या पत्रकारिता की स्वतंत्रता?

इस पूरे विवाद में दो संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन का सवाल है।

एक तरफ आम नागरिक का निजता का अधिकार है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2017 के पुट्टस्वामी फैसले में मौलिक अधिकार माना था।

दूसरी तरफ संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता का सवाल है। इसके साथ नागरिकों का जानने का अधिकार और लोकतंत्र में सरकारी जवाबदेही भी जुड़ी हुई है।

किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी में अनावश्यक दखल देना पत्रकारिता नहीं है। लेकिन किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के भ्रष्टाचार, सरकारी धन के दुरुपयोग या जनहित से जुड़े मामलों की तथ्यात्मक पड़ताल करना पत्रकारिता की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

इसलिए जरूरत ऐसे कानूनी संतुलन की है, जिसमें आम नागरिक की निजता भी सुरक्षित रहे और जनहित की खबरें प्रकाशित करने वाले पत्रकारों को भी स्पष्ट संरक्षण मिले।

निष्कर्ष: DPDP Act को केवल डेटा सुरक्षा का कानून समझकर इसके पत्रकारिता पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वहीं इसे पत्रकारिता खत्म करने वाला कानून घोषित करना भी अभी कानूनी रूप से सही नहीं होगा। असली सवाल यह है कि क्या कानून में ऐसी स्पष्ट पत्रकारिता छूट और सुरक्षा व्यवस्था होगी, जिससे निजता की रक्षा के साथ भ्रष्टाचार और सत्ता की जवाबदेही से जुड़ी खबरें भी बिना अनुचित दबाव के प्रकाशित हो सकें। अब सबकी नजरें 17 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।

— मगध लाइव न्यूज़ डेस्क

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