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“भगत सिंह को फांसी नहीं लिखी, अपना इस्तीफा लिख दिया!” – वो मुस्लिम जज जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी

On: Wednesday, January 7, 2026 3:20 PM

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में लाखों क्रांतिकारियों ने अपनी शहादत दी तब जाकर हमें आजादी मिली। इस संग्राम में सभी धर्मों के लोगों ने अपना साथ दिया। आज के परिदृश्य में  जब इस विषय पर चर्चा होती है तो कुछ लोग या कहे कुछ लोगों का समूह के द्वारा मुसलमानों को अक्सर राष्ट्र-विरोधी बताकर निशाना बनाया जाता है, तब इतिहास की ऐसी घटनाएं महत्वपूर्ण हो जाती हैं जो इस मिथक को तोड़ती हैं। जस्टिस सैयद आगा हैदर (1876-1947) एक ऐसे भारतीय जज थे, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनी और भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फांसी की सजा सुनाने से इनकार कर अपना पद त्याग दिया। वे इलाहाबाद और लाहौर हाई कोर्ट के जज रहे, और लाहौर षड्यंत्र केस में उनकी भूमिका ने साबित किया कि न्याय सत्ता से ऊपर है। इस लेख में हम उनकी जीवनी और भगत सिंह की फांसी से जुड़ी विस्तृत, तथ्यात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहे हैं, जो ऐतिहासिक स्रोतों पर आधारित है। यह रिपोर्ट दर्शाती है कि स्वतंत्रता आंदोलन में मुसलमानों का योगदान कितना गहरा था और कई प्रमुख नेता जैसे मौलाना अबुल कलाम आजाद, खान अब्दुल गफ्फार खान तथा हसरत मोहानी ने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी।

जस्टिस सैयद आगा हैदर की जीवनी

सैयद आगा हैदर का जन्म 1876 में उत्तर प्रदेश के एक प्रतिष्ठित मुस्लिम परिवार में हुआ। वे एक योग्य बैरिस्टर थे, जिन्होंने ब्रिटिश भारत में कानूनी शिक्षा प्राप्त की और इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकालत शुरू की। उनकी प्रतिभा के कारण उन्हें जल्द ही जज नियुक्त किया गया, और वे इलाहाबाद तथा बाद में लाहौर हाई कोर्ट में सेवा देते रहे। हैदर एक पश्चिमी प्रभाव वाले भारतीय थे, लेकिन उनके मन में राष्ट्रीय भावना गहरी थी। वे ब्रिटिश न्याय व्यवस्था में काम करते हुए भी औपनिवेशिक अन्याय के खिलाफ खड़े होते थे।

1930 के लाहौर षड्यंत्र केस में उनकी नियुक्ति स्पेशल ट्रिब्यूनल में हुई, जहां वे एकमात्र भारतीय जज थे। ट्रायल के दौरान उनकी निष्पक्षता ने ब्रिटिश अधिकारियों को असहज कर दिया। ट्रिब्यूनल से हटाए जाने के बाद, उन्होंने अपना पद त्याग दिया और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर लौट आए। 1937 के प्रांतीय चुनावों में उन्होंने सहारनपुर निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ा और राजनीतिक जीवन में सक्रिय रहे। उनकी मृत्यु 1947 में हुई, जो भारत की आजादी के वर्ष ही था। उनके परपोते के अनुसार, हैदर ने ब्रिटिश दबाव में फांसी का फैसला लिखने से इनकार करते हुए कहा, “मैं जज हूं, कसाई नहीं।” उनका परिवार आज भी उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद करता है जिसने ब्रिटिश के सामने ‘कलम तोड़ी’। हैदर की कहानी स्वतंत्रता संग्राम में मुसलमानों के योगदान का प्रतीक है, जहां उन्होंने व्यक्तिगत जोखिम उठाकर न्याय की रक्षा की।

लाहौर षड्यंत्र केस: भगत सिंह की फांसी की विस्तृत रिपोर्ट

लाहौर षड्यंत्र केस (Lahore Conspiracy Case) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक प्रमुख घटना थी, जिसमें भगत सिंह और उनके साथियों को ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन पी. सॉन्डर्स की हत्या तथा अन्य क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए दोषी ठहराया गया। केस की शुरुआत 1928 से हुई, जब भगत सिंह, सुखदेव थापर, शिवराम राजगुरु और अन्य हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के सदस्यों ने साइमन कमीशन के विरोध में प्रदर्शन किए। 17 दिसंबर 1928 को लाला लाजपत राय की मौत के बदले में सॉन्डर्स की हत्या की गई।

8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में धुआं बम फेंके, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया। ट्रायल 10 जुलाई 1929 को लाहौर की बोर्स्टल जेल में शुरू हुआ। आरोपियों ने राजनीतिक कैदियों के रूप में बेहतर सुविधाओं की मांग में भूख हड़ताल की, जो 116 दिनों तक चली। ब्रिटिश सरकार ने ट्रायल को तेज करने के लिए 1 मई 1930 को लाहौर ऑर्डिनेंस नंबर III जारी किया, जिसके तहत एक स्पेशल ट्रिब्यूनल गठित किया गया। इस ट्रिब्यूनल में अपील का कोई अधिकार नहीं था, और यह सामान्य न्यायिक प्रक्रियाओं से अलग था। ट्रिब्यूनल के सदस्य थे: जस्टिस जे. कोल्डस्ट्रीम (अध्यक्ष, ब्रिटिश), जस्टिस जी.सी. हिल्टन (ब्रिटिश), और जस्टिस सैयद आगा हैदर (भारतीय)। ट्रायल 5 मई 1930 को शुरू हुआ।

ट्रायल के दौरान, 12 मई 1930 को आरोपियों को कोर्ट में लाया गया, जहां उन्होंने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगाए। जस्टिस कोल्डस्ट्रीम के आदेश पर पुलिस ने कोर्ट में ही उन्हें पीटा, जिससे गंभीर चोटें आईं। इस घटना के बाद आरोपियों और उनके वकीलों ने ट्रायल का बहिष्कार किया। ट्रायल 30 सितंबर 1930 को समाप्त हुआ, और 7 अक्टूबर 1930 को 300 पेज के फैसले में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई। अन्य आरोपियों को विभिन्न सजाएं मिलीं, जैसे आजीवन कारावास या रिहाई। प्रिवी काउंसिल में अपील खारिज हुई, और 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल (अब शादमान चौक) में तीनों को फांसी दे दी गई। पूरा ट्रायल कानूनी उल्लंघनों से भरा था: आरोपियों की अनुपस्थिति में फैसला, गवाहों की जबरन गवाही, और ऑर्डिनेंस की वैधता पर सवाल।

ट्रायल में जस्टिस आगा हैदर की भूमिका

ट्रिब्यूनल में हैदर ने बचाव पक्ष की भूमिका निभाई। उन्होंने अभियोजन के गवाहों—जैसे जय गोपाल, फोनींद्र नाथ घोष, मनमोहन बनर्जी, हंस राज वोहरा और राम सरन दास—की कड़ी क्रॉस-एक्जामिनेशन की। गवाहों ने पुलिस द्वारा सिखाए गए बयानों को स्वीकार किया, और सात में से छह गवाह होस्टाइल हो गए। 30 मई 1930 को राम सरन दास ने पुलिस द्वारा दिए गए दस्तावेज पेश किए, जो गवाहों को सिखाने की साजिश दर्शाते थे। हैदर ने कोर्ट में हिंसा का विरोध करते हुए कहा, “मैं आरोपी को कोर्ट से जेल ले जाने के आदेश में शामिल नहीं था और इसके लिए जिम्मेदार नहीं हूं।”

20 जून 1930 को ट्रिब्यूनल के आखिरी दिन, हैदर की फांसी विरोधी राय स्पष्ट थी। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन वे नहीं माने। 21 जून 1930 को चीफ जस्टिस शादी लाल ने उन्हें “स्वास्थ्य कारणों” से हटा दिया। ट्रिब्यूनल पुनर्गठित किया गया, जिसमें जस्टिस सर अब्दुल कादिर और जस्टिस टैप शामिल हुए। हैदर ने इस्तीफा दे दिया, क्योंकि वे फांसी का फैसला नहीं लिखना चाहते थे। इतिहासकार सत्विंदर सिंह जस की किताब ‘द एक्जीक्यूशन ऑफ भगत सिंह: लीगल हेरेसीज ऑफ द राज’ में इसे ब्रिटिश साजिश बताया गया है।

निष्कर्ष: आज के भारत में प्रासंगिकता

जस्टिस सैयद आगा हैदर की कहानी साबित करती है कि स्वतंत्रता संग्राम में मुसलमानों का योगदान सिर्फ लड़ाई तक सीमित नहीं था, बल्कि न्यायिक और बौद्धिक स्तर पर भी था। आज जब मुसलमानों को राष्ट्र-विरोधी बताकर हाशिए पर धकेला जा रहा है, तब यह याद दिलाना जरूरी है कि भारत की आजादी में उनका हिस्सा 30% से अधिक शहीदों का था, जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘Dictionary of Martyrs’ में दर्ज है। हैदर जैसे व्यक्तियों ने दिखाया कि सच्चा राष्ट्रवाद विवेक और न्याय पर आधारित होता है, न कि मजहबी पूर्वाग्रहों पर। यह लेख इतिहास की सच्चाई को सामने लाता है, ताकि हम एक समावेशी भारत का निर्माण कर सकें।

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