मोक्ष नगरी गया जी में 15 दिनों तक पिंडदान और तर्पण करने के बाद श्रद्धालुओं ने देवघाट पर किया दीपदान, पितरों के मार्ग को किया रोशन।
मगध लाइव न्यूज़ डेस्क | गया
मोक्ष की नगरी गया जी में इन दिनों आस्था और भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। सनातन धर्म की प्राचीन परंपराओं का निर्वहन करते हुए, देश के कोने-कोने से आए तीर्थयात्रियों ने फल्गु नदी के देवघाट पर दीप जलाकर ‘पितृ दीपावली’ (देव दिवाली) मनाई।
15 दिनों के अनुष्ठान के बाद दीपदान गया की पावन धरा पर पिछले 15 से 20 दिनों से अपने पितरों के निमित्त पार्वण श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण कर रहे श्रद्धालुओं ने तेरस के दिन यह विशेष दीपदान किया। छत्तीसगढ़ के कोरबा से आए सिंघाने परिवार ने बताया कि देवघाट पर पिंडदान करने और देव दिवाली मनाने से उन्हें असीम शांति और आनंद की अनुभूति हो रही है। श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि उनके पितृ देव सीधे भगवान विष्णु के श्री चरणों में पहुंच चुके हैं और वहां से अपने परिजनों को शुभ आशीर्वाद प्रदान कर रहे हैं।

क्या है पितृ दीपावली का महत्व? तीर्थयात्रियों के अनुसार, इस देव दिवाली का मुख्य उद्देश्य पितरों के मार्ग को प्रकाशित करना है। ऐसी मान्यता है कि जब पितृ ब्रह्मलोक की ओर प्रस्थान करते हैं, तो परिजनों द्वारा जलाए गए इन दीयों के प्रकाश से उनका रास्ता ज्योतिर्मय हो जाता है। इससे उनके सफर में कोई अंधकार नहीं रहता और वे शांतिपूर्वक विष्णु धाम तक पहुंचते हैं।

संसार से अंधकार मिटने की प्रार्थना देवघाट पर दीपदान करते हुए श्रद्धालुओं ने सच्ची श्रद्धा के साथ यह कामना की कि पितृ देवता उनके परिवारों और पूरे संसार के जीवन से अंधकार दूर करें। उन्होंने प्रार्थना की कि पितरों की कृपा से सबके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का उजाला फैले।
इस दौरान घाट पर मौजूद लोगों ने यह भी इच्छा जताई कि आने वाली पीढ़ियां भी इस पावन और सनातन परंपरा को इसी श्रद्धा और भक्ति के साथ आगे बढ़ाती रहें। फल्गु के तट पर जलते इन हजारों दीपों ने न सिर्फ देवघाट को रोशन किया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि अपनों के प्रति श्रद्धा और प्रेम मृत्यु के बाद भी कभी खत्म नहीं होता।







