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✍️पाठकों की कलम से: क्रांति से दफ्तर तक: एक ‘स्थगित क्रांतिकारी’ की दास्तां

On: Saturday, January 17, 2026 5:19 PM

✍️अंकुर रंजन
चांद चौरा गया, बिहार

चलिए एक नौकरीपेशा व्यक्ति की क्रांतिकारिता के सफ़र का बखान करता हूँ. 2021 में नीलोत्पल मृणाल की किताब “औघड़” को पढ़ा था मैंने जिसमे एक वाक्य था जिसे आज भी मैं अपने अगल बगल किसी व्यक्ति में महसूस करता हूँ तो हंस पड़ता हूँ. वो पंक्ति थी “अक्सर ज्यादातर आदमी अपनी जवानी के दौर में समाजवादी, नारीवादी या मार्क्सवादी में से कुछ-न-कुछ जरूर होता है और एक दौर के बाद वो निश्चित रूप से इनमें से कुछ भी नहीं होता है, सिर्फ कमाता-खाता आदमी होता है।”

एक नौकरीपेशा आदमी खासकर वो जो अपने स्कूल कॉलेज के दिनों में सच में कुछ बदलने की सोच रखता था उसके लिए सबसे मुश्किल भरा दौर होता है क्रांति से दफ्तर तक का सफर।
चलिए एक कहानी सुनाता हूँ एक नौकरीपेशा व्यक्ति की. इस कहानी को पढने वाले हर व्यक्ति इस कहानी के काल्पनिक किरदार का नाम खुद ब खुद खोज सकते हैं और कहानी का अंत भी अपने अनुसार कर सकते हैं।

यह कहानी है श्रीमान …………………………. की, उनके क्रांति से दफ्तर तक के सफर का

इनका जीवन किसी इंकलाबी पोस्टर से कम नहीं था। स्कूल के दिनों में नाटक, जोशीले भाषण, सुबह उठते ही अपने ऊपर वाले कमरे में किताबें लेकर पढना और आँखों में ‘परिवर्तन’ की आग। वह गर्व से कहता था, “व्यवस्था ख़राब है, और मैं इसे बदलूँगा!” UPSC नहीं तो कम से कम BPSC निकाल ही लूँगा और समाज को बदल दूंगा. जातिवाद उसके लिए एक अभिशाप था, और वह खुद को ‘भेदभाव का श्मशान’ बनाने निकला था। 

लेकिन, फिर आई वह सरकारी परीक्षा जिसे वह बारहवीं देने के बाद ही पास कर चूका था. बहुत खुश था वो. शुरुआत में, यह नौकरी केवल एक ‘रणनीतिक विराम’ थी। “अंदर घुसकर व्यवस्था को बदलूँगा,” उसने अपने आप को समझाया। “यह दफ्तर नहीं, मेरा ‘ऑपरेशन थिएटर’ है।” मैं यहीं से समय निकालकर UPSC की तैयारी करूँगा. यहाँ न हुआ तो शाम में घर जाकर अपने इस ऑपरेशन “ समाज परिवर्तन” को अंजाम दूंगा. और इस तरह, श्रीमान ने अपनी पहली और शायद सबसे बड़ी क्रांति की “ उसने अपने सपने को ‘स्थायी आय’ के साथ बदल लिया”। इसकी इस क्रांति से इसके पूरे घरवालो को लाभ मिल रहा था और सब लोग खुश थे. सबने सोचा “बेटा आखिरकार क्रांतिकारी बन ही गया”.

श्रीमान के सरकारी दफ्तर ने, उनके ‘समाज-सेवा’ के परिभाषा को बदल दिया । नई परिभाषा थी , फाइल पर सही स्टाम्प लगाना, पेड एंड cancelled लगा है या नहीं, पास्ड फॉर पेमेंट लगा है या नहीं, ऊपरी अधिकारी कहीं नाराज़ तो नहीं हैं उन्हें मनाना , और यह सुनिश्चित करना कि अपनी ‘अटेंडेंस’ रजिस्टर में सही समय पर लगी है या नहीं।

जब कोई गरीब, शोषित व्यक्ति उसके पास आता है, तो श्रीमान के भीतर का पुराना क्रांतिकारी फुसफुसाता है, “उठो! मदद करो!” लेकिन, उसकी ‘9 से 5’ की आत्मा चिल्लाती है, ” एप्लीकेशन देकर चल जाइये और अपना फ़ोन नंबर लिख दीजिये, कल खोजकर बताते हैं, कहाँ है? बिना कागज़ के कुछ नहीं होगा
उसका सामाजिक न्याय अब बस इतना है की किसी भी फाइल को जाति या धर्म देखकर ‘होल्ड’ न करना। यह एक छोटी जीत है, जो उसकी ज़िन्दगी की बड़ी हार को छुपाती है जिसे वह भी जानता है।

क्रांति करूँ या नौकरी यह सवाल श्रीमान खुद से बार बार पूछता है. जब सूरज उगता है और दफ्तर के दरवाज़े खुलते हैं, तो वहाँ केवल एक सरकारी बाबू नहीं बैठता। वहाँ बैठता है एक पूर्व-क्रांतिकारी, एक भूतपूर्व-समाज-सुधारक, एक रिटायर्ड-विचारक। उसकी मेज़ पर फाइलों का ढेर उतना ही ऊंचा है, जितना कभी उसके सपनों का आसमान हुआ करता था। वह शख्स जिसने दुनिया को बदलने, समाज से जातिगत भेदभाव को मिटाने, एक बड़ा अधिकारी बनकर व्यवस्था को ठीक करने की मुहर लगाई थी , आज बस एक मुहर है – एक ‘9 से 5’ की मुहर, जो कागज़ों पर लगती है, और सबसे बड़ी बात, उसकी आत्मा पर भी लग चुकी है।

दोपहर के खाने के समय श्रीमान अपने साथी कर्मचारियों को बताता है, “यार, सच कहूँ, तो मैंने तो ‘सिविल सर्विसेज’ की तैयारी इसलिए की थी ताकि जातिगत बेड़ियों को तोड़ सकूँ।” उसके सहयोगी, जो बरसों से ये सब सुनकर चिकने हो चुके हैं, सिर्फ मुस्कुराते हैं। वे जानते हैं कि क्रांति एक महंगा शौक है, और सरकारी नौकरी उसकी मासिक किश्त है।

अब श्रीमान कभी-कभी सोशल मीडिया पर जातिवाद के खिलाफ एक लंबा-चौड़ा पोस्ट लिखते हैं। हो सके तो क्रांतिकारिता से मिलता जुलता कोई चित्र मिल जाए उसे अपने whatsapp पर स्टेटस लगा देते हैं . श्रीमान अपने परिवार, समाज और दफ्तर में यह जताना चाहते हैं की उनके अन्दर से अभी भी क्रांतिकारिता की आग मरी नहीं है. यह एक ‘वर्चुअल-क्रांति’ है, जिसे ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ मिलते हैं, लेकिन दफ्तर के बाहर की दुनिया पर इसका कोई असर नहीं होता।

उसकी सबसे बड़ी चिंता अब यह नहीं है कि समाज से जातिवाद कैसे मिटेगा। उसकी सबसे बड़ी चिंता है कि ‘प्रोमोशन’ कितने समय में मिलेगा, ‘इंक्रीमेंट’ कब लगेगा, TA/DA का पैसा समय पर कब आएगा और पत्नी सरकारी मास्टरनी कब तक बन जाएगी।

श्रीमान को अब एहसास होता है कि उसने ‘व्यवस्था को बदलने’ के लिए उसमें प्रवेश नहीं किया, बल्कि व्यवस्था ने उसे बदल दिया। वह एक ऐसा योद्धा था जिसने अपने हथियार (आदर्श और जुनून) फेंक दिए और दुश्मन (व्यवस्था) की सेना में एक आरामदायक “बाबू” की नौकरी ले ली। वह अब दफ्तर का एक अनिवार्य पुर्ज़ा है, जो बिना आवाज किए, बिना सवाल किए अपना काम करता है।
जातिगत भेदभाव अब उसे सिर्फ ‘मानव संसाधन’ की एक जटिल समस्या लगती है, न कि एक जलता हुआ सामाजिक घाव। वह जानता है कि क्रांति हमेशा सड़कों पर नहीं होती, कभी-कभी वह ‘ई.एम.आई.’ की किश्तों, क्रेडिट कार्ड के बिल , SIP म्यूच्यूअल फण्ड की राशि और वेकेशन प्लान के नीचे दबकर मर जाती है।

शाम 5 बजे, जब वह दफ्तर से निकलता है, तो श्रीमान अपने आप से पूछता है, “आज मैंने कौन सी दुनिया बदली?”
जवाब आता है: “आज तुमने एक और फाइल निपटा दी, बेटा! तुमने आज 5 ठेकेदारों के बैंक खाते में पैसे भेज दिए, तुमने आज कोई भी गाली नहीं सुनी अपने बॉस से. और क्या ही चाहिए तुम्हे ज़िन्दगी में, इतना सब तो है।

क्रांति करूँ या नौकरी? श्रीमान फिर से यह सवाल खुद से करता है। उसे अब अपने इस सवाल का जवाब मिल गया है। उसने ‘सुरक्षित भविष्य’ के लिए ‘सामाजिक जिम्मेदारी’ को स्थगित कर दिया है। और इस तरह, भारत का हर दूसरा दफ्तर (सरकारी या प्राइवेट) ऐसे ही हजारों ‘स्थगित क्रांतिकारियों’ का कब्रिस्तान बन जाता है.

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