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पाठकों की कमल से✍️ : आज़ादी नहीं, ‘मालिक’ बनने की भूख: क्या हम गुलामी के अंतहीन चक्र में फंसे हैं?

On: Wednesday, January 14, 2026 3:42 AM

​”अक्सर हम सोचते हैं कि शोषण का शिकार व्यक्ति न्याय और समानता की तलाश में होगा, लेकिन मनोविज्ञान का एक स्याह पक्ष कुछ और ही कहानी बयां करता है। मशहूर दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे के सिद्धांतों और ‘Identification with the Aggressor’ की अवधारणा को समेटे हुए, यह लेख हमारे सामाजिक और पेशेवर ढांचों के उस कड़वे सच को उजागर करता है जिसे हम अक्सर देख नहीं पाते।

‘मगध लाइव’ के विशेष कॉलम ‘पाठकों की कलम से’ के अंतर्गत, आज हम एक ऐसा विश्लेषण साझा कर रहे हैं जो सास-बहू के पारंपरिक रिश्तों से लेकर आधुनिक दफ्तरों की कार्यप्रणाली तक में रचे-बसे ‘सत्ता और दासता’ के अंतहीन चक्र पर सवाल खड़े करता है। क्या हम वाकई आज़ादी चाहते हैं, या सिर्फ अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं? पढ़िए यह विशेष लेख।”

✍️ अंकुर रंजन  चांदचौरा, गयाजी (बिहार)

समाज में जब Slave (गुलाम) की अवधारणा पनपी होगी तो गुलाम बनाये या बने जाने वाले इंसान के मन में सबसे पहले क्या आया होगा? क्या वो यह सोचते होंगे की एक न एक दिन हमें इस गुलामी से आजादी मिलेगी? क्या हम भी इस स्वतंत्र जहाँ में अपनी खुद की मर्जी के मालिक होंगे? नहीं . वो ऐसा बिल्कुल भी नहीं सोचते थे. 

फ्रेडरिक नीत्शे ने अपनी पुस्तक Beyond Good and Evil और On the Genealogy of Morality में मास्टर मॉरैलिटी और स्लेव मॉरैलिटी की अवधारणा दी है। नीत्शे का मानना था कि नैतिकता स्थिर नहीं होती, बल्कि यह शक्ति और सामाजिक स्थिति से पैदा होती है। हम जहाँ ये सोच रहे की गुलामों की नैतिकता आजादी रही होगी या इन जंजाल को ख़त्म करना रहा होगा, ऐसा बिल्कुल भी नहीं था. 

“जब कोई गुलाम दासता की बेड़ियों में जकड़ा जीवन जी रहा होता है, तो उसके मन में सबसे पहली और प्रबल महत्वाकांक्षा यही जन्म लेती है कि एक दिन वह भी अपने स्वामी की भाँति शक्तिशाली बने। वह स्वप्न देखता है कि भविष्य में वह भी किसी विवश और असहाय व्यक्ति को अपना दास बनाएगा।

जैसे-जैसे उस पर होने वाले अत्याचार और यातनाएं बढ़ती हैं, उसके भीतर की यह प्रतिशोधात्मक महत्वाकांक्षा और भी गहरी होती जाती है। वह स्वयं से यह संकल्प करता है कि जब वह सत्तासीन होगा, तो वह अपने पास स्वयं से भी अधिक उत्तम कोटि का गुलाम रखेगा। उसके कष्ट उसे सहानुभूति की ओर नहीं, बल्कि उसी दमनकारी व्यवस्था का हिस्सा बनने की तीव्र लालसा की ओर ले जाते हैं।

ठीक यही घटना हमारे समाज में सास और बहू के रिश्ते में घटती है। एक स्त्री जब किसी घर की बहू बनकर आती है, तो उसकी सास यानी उसके पति की माँ एक ‘मालिक’ का किरदार निभाती है। सास बहू से तरह-तरह के नखरे उठाने को कहती है। घर में अगर कामवाली आ भी रही हो, तो भी सास के मन में यही रहता है कि एक ‘नई-नवेली दासी’ आई है; इसी को सारे काम सौंप देते हैं। बहू भी सास-ससुर की नज़रों में खुद को साबित करने के लिए यह ज़िम्मेदारी ले लेती है।

विवाह, विशेषकर अरेंज मैरिज और वह भी ऐसी जगह जहाँ लड़की की शादी किसी इकलौती संतान से हुई हो, वहाँ वह स्त्री इस दासता को हँसकर स्वीकार कर लेती है। सास जब-जब कहती है कि ‘घूँघट डालो’, वह हँसकर डालती है; ‘नए-नए पकवान खिलाओ’, तो वह हँसकर खिलाती है। उसके मन में बस यही चल रहा होता है कि जब वह स्वयं सास बनेगी, यानी जब उसका बेटा अपनी पत्नी घर लाएगा, तब वह उससे इससे भी उच्च कोटि के नियम और काम करवाएगी और खुद को एक ‘अच्छे मालिक’ की श्रेणी में तब्दील करेगी।

और हाँ, बहुओं की यह गुलामी उस वक्त प्रतिस्पर्धा में बदल जाती है जब उसके पति का एक और भाई होता है और वह भी घर में अपनी पत्नी ले आता है। तब इन दोनों बहुओं की दासता एक होड़ बन जाती है और सास एक उत्तम एवं समझदार मालिक का रूप स्वीकार कर लेती है।

सरकारी कार्यालयों के भीतर अक्सर ‘स्वामी और दास’ जैसी मानसिकता देखने को मिलती है। जब कोई लिपिक या निम्न स्तर का कर्मचारी अपने उच्चाधिकारी की कड़वी बातों, व्यंग्यों और अपमानजनक व्यवहार को सहता है, तो उसके भीतर सुधार की भावना के बजाय प्रतिशोध का जन्म होता है। उसके मन में केवल एक ही विचार घर कर जाता है— “कैसे भी करके मुझे इस पद तक पहुँचना है।”

यही स्थिति उच्च अधिकारियों के बीच भी बनी रहती है। जब सबसे ऊँचे पद पर बैठा अधिकारी अपने ठीक नीचे के अधिकारी को फटकार लगाता है, तो वह अधीनस्थ अधिकारी भी इसी उधेड़बुन में रहता है कि कब यह पद रिक्त हो या कब उसका पदोन्नति हो. “जिस दिन मैं इस कुर्सी पर बैठूँगा, तब दिखाऊँगा कि काम कैसे करवाया जाता है। मैं इससे भी बेहतर ‘मालिक’ बनकर दिखाऊँगा और अपने अधीनस्थों पर अपनी सत्ता का प्रभाव सिद्ध करूँगा।”

यह तीनों की स्थिति ‘Identification with the Aggressor’ कहलाती है। पीड़ित व्यक्ति को लगता है कि दुख से बचने का एकमात्र तरीका ‘मालिक’ बन जाना है। यह विडंबना ही है कि व्यवस्था का शिकार व्यक्ति अक्सर व्यवस्था को बदलने के बजाय, स्वयं उस व्यवस्था का सबसे कठोर हिस्सा बनने का स्वप्न देखने लगता है। जब व्यक्ति लंबे समय तक दुःख सहता है, तो कई बार उसकी संवेदनशीलता समाप्त हो जाती है और वह उसी दासता को सफलता का पैमाना मान लेता है और यही वह मानसिकता है जो समाज में शोषण के चक्र को कभी खत्म नहीं होने देती, क्योंकि गुलाम आजाद होने के बजाय खुद मालिक बनना चाहता है।

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1 thought on “पाठकों की कमल से✍️ : आज़ादी नहीं, ‘मालिक’ बनने की भूख: क्या हम गुलामी के अंतहीन चक्र में फंसे हैं?”

  1. गजब शानदार,,,, लाजवाब,,, बेहतरीन लेखक का प्रस्तुत किया जाना, आज इस भागम~भाग भरी जिंदगी में महान लेख परोसा जाना मायने रखता है

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