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✍️ दीपक कुमार

दिल्ली: बिहार की राजनीति के एक स्तंभ, श्री सुशील मोदी का सोमवार को दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया। वे 72 वर्ष के थे और लंबे समय से कैंसर से जूझ रहे थे।

उनके जीवन के अंतिम दिनों में, श्री मोदी ने अपने सार्वजनिक जीवन का एक अंतिम संदेश दिया था, जिसे उन्होंने 03 अप्रैल को सोशल मीडिया पर साझा किया। उन्होंने लिखा, “पिछले छह माह से कैंसर से संघर्ष कर रहा हूं। अब लगा कि लोगों को बताने का समय आ गया है। लोकसभा चुनाव में कुछ कर नहीं पाऊंगा। प्रधानमंत्री को सब कुछ बता दिया है। देश, बिहार और पार्टी का सदा आभार और सदैव समर्पित।” इस भावपूर्ण संदेश ने उनके समर्थकों और अनुयायियों को गहराई से छुआ।

जब वे बिहार लौटे, तो उनकी हालत देखकर समर्थकों को झटका लगा। उनका शरीर अचानक गिर गया था, जिससे उनके स्वास्थ्य की गंभीरता का पता चला। उनके आवास पर भाजपा के कई दिग्गज नेता मिलने के लिए पहुंचे, लेकिन परिजनों ने उनकी तस्वीर लेने से मना कर दिया, जिससे उनकी निजता का सम्मान किया जा सके।

बिहार के अनुभवी योद्धा: सुशील मोदी का युग समाप्त

श्री मोदी का जन्म 5 जनवरी 1952 को पटना में हुआ था। उन्होंने पटना साइंस कॉलेज से बॉटनी में ग्रेजुएशन किया था और बाद में जय प्रकाश नारायण के आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत 1990 में हुई जब वे पहली बार बिहार विधानसभा के लिए विधायक चुने गए। उन्होंने बिहार के वित्त मंत्री के रूप में और बाद में उप-मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की सेवा की। उनकी राजनीतिक सूझबूझ और प्रशासनिक क्षमता ने बिहार के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

श्री मोदी ने अपने जीवन में न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक क्षेत्र में भी अनेक उपलब्धियाँ हासिल कीं। वे एक लाइफलॉन्ग सदस्य के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे और उन्होंने जीएसटी के कार्यान्वयन के लिए राज्य वित्त मंत्रियों की अधिकारिक समिति के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया।

श्री मोदी के निधन पर बिहार की राजनीति में शोक की लहर है। उनके जाने से राज्य ने एक अनुभवी नेता और एक समर्पित जनसेवक को खो दिया है। उनका पार्थिव शरीर मंगलवार सुबह पटना के राजेन्द्र नगर स्थित उनके आवास पर लाया जाएगा, जहाँ लोग अंतिम दर्शन के लिए जुट सकेंगे।