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डीएफसीसीआईएल के एक पत्र ने बसी बसाई नगरी को उजाड़ दिया, लोग खुद घर खाली कर तोड़ने को हो गए मजबूर

सांसद, विधायक तो दूर क्षेत्र के वार्ड पार्षद भी इनकी सुध लेने नहीं आए

वरीय संवाददाता देवब्रत मंडल

भारत सरकार का एक उपक्रम है डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड। इस उपक्रम को बिहार में विशेष रेल परियोजना डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के लिए नई रेल लाइन बिछाने की जिम्मेदारी रेल मंत्रालय ने सौंपी है। इसमें एक WDFC (वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर) और दूसरा EDFC (ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर)। EDFC परियोजना बिहार के कई जिले से जुड़ती है, जिसमें एक गया जिला भी है। गया जिले के नगर प्रखंड और मानपुर प्रखंड के 14 मौजा की भूमि अधिग्रहण के दायरे में है। लेकिन हम बात कर रहे हैं नगर प्रखंड के गया नगर निगम के वार्ड नंबर 4 की। जिसे राजस्व वार्ड नं 1 कहा या माना जाता है। इस वार्ड में कई प्लॉट की जमीन का मुआवजा राशि अधिकांश भूधारियों व उस पर बने मकानों के मालिकों को इसी वर्ष मार्च, अप्रैल व मई महीने में दे दिए गए हैं। कुछ लोग राशि के लिए कार्यालयों से वैध कागजत के लिए दौड़ लगा रहे हैं। बात इस नगर निगम के वार्ड नं 4 (छोटकी नवादा) की है। डीएफसीसीआईएल, गया के उप परियोजना प्रबंधक खालिद फैजल ( Khalid Faisal ) ने KKK/LA/Gaya/Office से एक पत्र जिसका नंबर 87/2774 दिनांक 25.05.2023 के माध्यम से सदर एसडीओ को पत्र लिखकर इस वार्ड में अवस्थित संरचना को खाली कराने के लिए एक दंडाधिकारी, पुलिस बल जिसमें महिला पुरुष दोनों उपलब्ध कराने की बात कही। इस पत्र के बारे में magadhlive की टीम को जब जानकारी मिली तो यहां बसे लोगों से magadhlive की टीम ने एक ग्राउंड रिपोर्टिंग करते हुए यहां से विस्थापित हो रहे लोगों की दर्द को सामने लाने की कोशिश की। जिसमें स्पष्ट था कि 2 जून से 7 जून तक संरचना को खाली कराना है। यहां बसे लोगों ने अपनी बात CM से लेकर DM और डीएफसीसीआईएल के शीर्ष अधिकारी तक पहुंचाते हुए कम से कम छह महीने की मोहलत देने की मांग की। इस बीच पता यह भी चला कि गया के डिप्टी पीएम(प्रोजेक्ट) के अनुरोध पत्र के प्राप्ति के बाद गया नगर अंचल के अंचलाधिकारी को बतौर इस कार्य को क्रियान्वित कराने के लिए दंडाधिकारी भी प्रतिनियुक्त कर दिया गया था(इसकी पुष्टि magadhlive नहीं करता है)। इसके बाद यहां बसे लोग जो कानून और और सरकारी आदेशों में विश्वास रखते हैं ने अधिग्रहित घरों को केवल खाली करने का काम ही नहीं किया, बल्कि मकानों को खुद तोड़ने भी शुरू कर दिए हैं। लेकिन यहां बसे लोगों के अनुरोध पर जिला प्रशासन या डीएफसीसीआईएल ने आगे क्या कोई रुख अपनाया या नया कोई आदेश जारी किया, यहां के लोगों को अबतक लिखित रूप में या फिर स्थल पर आकर किसी सक्षम पदाधिकारी ने मौखिक जानकारी नहीं दी है। ऐसे में कानून और देश के विकास में साथ देने वाले रैयत खुद घर तोड़ रहे हैं और किराए के मकान में चले गए हैं। ताकि देश के खास कर रेल के विकास में बाधक नहीं बनूं। यहां एक अवार्डी रेणु सिन्हा हैं। जो पटना में कैंसर का इलाज करा रही हैं। इनके पति और दोनों पुत्र इस बात को लेकर परेशान हैं कि इस दोराहे पर खड़ी जिंदगी और मौत के बीच क्या करें। वहीं पटना में इलाजरत रहे सेवानिवृत्त रेलकर्मी केएन प्रसाद को तो पटना में इलाज के दौरान डीएफसीसीआईएल के कार्यालय से फोन कर घर पर बुला लिया गया। अब ये भी अपना घर खाली कर रहे हैं। ऐसे और भी कई लोग हैं जो डीएफसीसीआईएल के एक पत्र को पढ़ने के बाद अपने घर मकां को खाली कर रहे हैं। अपने हाथों से बसी बसाई नगरी से ही उजड़ गए हैं। इस क्षेत्र के वार्ड पार्षद, नगर विधायक, मेयर, डिप्टी मेयर व सांसद एक बार भी इनकी सुध लेने नहीं आए हैं कि आखिर ऐसे परिवार के लोगों के साथ आखिर हो क्या रहा है? हालांकि सामाजिक कार्यकर्ता दिलीप कुमार मंडल जो कि इसी वार्ड नं 4 के रहनेवाले हैं का कहना है सरकार विस्थापित हो रहे लोगों की दर्द को समझे। उन्होंने कहा कि विस्थापित होने वाले हजारों परिवार जिसमें किसान भी हैं को रेलवे एक्ट ( डीएफसीसीआईएल) के तहत जो अतिरिक्त राशि दिए जाने का प्रावधान है, वो राशि सरकार पहले इन्हें मुहैया कराए। इसके बाद जो जमीन का दर और प्रकृति बता कर मुआवजे का भुगतान कर रही है, वो बिल्कुल ही गलत और नियम के विरुद्ध भी है। आज यहां जमीन 25 से 30 लाख रुपए प्रति 3.12 डिसमल की दर से खरीदी व बेची जा रही है, लेकिन इन रैयतों को हाथ उठाई की तरह राशि दी गई है।